Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यदिन्दुमण्डलं नाम स सम्राड् जीव उच्यते ।
शरीरकर्ममनसां बीजं मूलं च कुरणम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
वही विराट् शरीर में जीव है, क्योकि अन्नरूप उसी च्रे समष्टि प्राणो का धारण होता है, इस
(&) देखिये यह श्रुति-“तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुविश्वरूपः प्राणः
पृथगृवर्त्मा सन्देहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ" ।
(79) यद्यपि छान्दोग्य श्रुति मेँ "लोमानि बहिः" यह कहा गया है तथापि दूसरी श्रुति के अनुरोध
से यहाँ “तारका” यह उक्ति हैँ ।
आशय से कहते हैं ।
जो यह चन्द्रमण्डल है वही सम्राट जीव कहलाता है। अन्नमय व्यष्टि शरीरों का वह बीज है,
प्राणहेतुक सम्पूर्ण कर्मों का मूल है और व्यष्टि मन का वही कारण (८) है