Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 178

एक सौ छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक यौ सतहत्तरवाँ सर्ग कल्पना से कारण सहित किन्तु वस्तुस्थिति से (वास्तविकता से) अकारण यह जगत्‌ अज्ञान से स्वप्नतुल्य है और ज्ञान से ब्रह्म ही है, यह वर्णन |

33 verse-groups

  1. Verses 1–2यह स्वप्नतुल्य सृष्टि अकारण ही है, ऐसा पीछे अनेक बार जो कह आये हैँ उस पर श्रीरामचन्द्रजी…
  2. Verse 3हम बीज और अंकुर आदि की कल्पनाप्रयूत कार्य-कारणता का निवारण नहीं करते, जो व्यवहार की व्यवस…
  3. Verse 4शरीर में परिव्राजक की “शव' बुद्धि, कामी पुरुष की "कामिनी" बुद्धि और कुत्ते की "भक्ष्य" बु…
  4. Verse 5तो क्या बिना किसी आलम्बन के ही कल्पना होती है ? इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं। जै…
  5. Verse 6अतएव वास्तविक दृष्टि से अकारण पदार्थता और कल्पना दुष्ट से सकारण पदार्थता दोनों का ही ब्रह…
  6. Verse 7यदि ब्रह्म उभयात्मक (सकारण पदार्थरूप ओर अकारण पदार्थरूप) है तो आपने अकारण पदार्थता पक्ष क…
  7. Verses 8–10जहाँ पर तत्त्वदृष्टि से नाना अनानारूप सब कुछ आदि-अन्तरहित शान्त अद्वितीय ब्रह्म ही भासता…
  8. Verse 11इस ब्रह्म में शून्यता और अशून्यता दोनों का अभाव है, क्योकि अशून्यता शून्य की अपेक्षा से ह…
  9. Verse 12सकल जगत्‌ की ब्रह्मैकघनता से शून्यता है, शून्यैकरसता से शून्यता नहीं है, ऐसा कहते हैं। जो…
  10. Verse 13जैसे अध्यारोप ओर अपवाद अज्ञो की दृष्टि से हैं तत्त्वज्ञानी पुरूष अज्ञानियों को प्रबुद्ध क…
  11. Verse 14हाँ, ऐसा होता, यदि ब्रह्म से भिन्न प्रधान, परमाणु आदि की कल्पना करनेवाला कोई अज्ञानी सिद…
  12. Verse 15तत्त्वज्ञानी के प्रति अज्ञानी क्यो नहीं है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। तत्त्वज्ञानी लोग एक ब…
  13. Verse 16ब्रह्म से अतिरिक्त तत्त्वज्ञानी नहीं है ऐसी संभावना कैसे करते हैं, क्योकि तार्किक ओर पामर…
  14. Verse 17यदि अज्ञानादि जगत की अधिष्ठानतारूप सवत्मिकता ब्रह्म का लक्षण हो तो ज्ञान से उसकी निवृत्ति…
  15. Verse 18अज्ञानी की बुद्धि के अनुसार जगत्‌ को अन्यसा मानकर सृष्टि के आदि में कारण है ऐसा स्वीकार क…
  16. Verse 19तत्त्वद्ृष्टि से सदा अखण्ड अद्वितीय ब्रह्म ही है कदाचित्‌ भी अणुमात्र भी इसमें हेरफेर नही…
  17. Verse 20इस प्रकार के स्वप्न, गन्धर्वनगर, मरुमरीचिका सदृश जगत्‌ में सत्यता सिद्ध करने के आग्रह से…
  18. Verse 21ज्ञानवाध्यता की अन्यथा उपपत्ति न होने के कारण भी जगत्‌ स्वप्नतुल्य ही है, इसलिए उनके लिए…
  19. Verse 22उसी बात का विस्तृतिकरण करते हैं। अप्रबुद्ध (सुप्त) पुरुष के स्वप्न के पृथिवी आदि पदार्थों…
  20. Verses 23–24स्वाप्न पदार्थ जब तक अज्ञात रहता है यानी यह स्वप्न है वास्तव नहीं है यों ज्ञात नहीं होता…
  21. Verse 25अग्नि की उष्णता, जल की शीतलता, सकल तेजो की प्रकाशता जैसे स्वभाव है वैसे ही ज्ञात ब्रह्म क…
  22. Verse 26मनोरथ से कल्पित नगर की तरह ध्याता के भेद से व्यवस्थित आकारवाला होने के कारण भी इसका सर्वस…
  23. Verse 27धर्म-अधर्म तो अमूर्त होने के कारण ही मूर्त देह आदि के उपादान कारण नहीं हो सकते हैं यों कर…
  24. Verse 28विज्ञानवादी के मत में भी अमूर्त ओर क्षणिक विज्ञान में मूर्त अक्षणिक की कारणता दुर्वच है,…
  25. Verse 29स्वभाववादी चार्वाक के मत का निराकरण करते हैं। अंकुरादि स्वभाव का काल, खेत, जलादि सहित स्व…
  26. Verse 30इससे परिशेषात्‌ हमारा सिद्धान्त सिद्ध हुआ, यों दिखलाते है। इसलिए सब पदार्थ और उनके कारण य…
  27. Verse 31अतएव ज्ञानी को अकृत करोड़ों अपराधों से भी मन में दुःख नहीं होता, ऐसा कहते हैं। जैसे स्वप्…
  28. Verses 32–33सृष्टि के आदि में उत्पन्न नहीं हुआ यह दृश्य चिदाकाशस्वरूप स्वप्न के तुल्य भासता है, इसलिए…
  29. Verse 34जैसे शुद्ध जलराशि में लहर, भँवर, द्रवता आदि भासते हैं वैसे ही ब्रह्म में यह सर्गपर्याय (स…
  30. Verse 35जैसे निर्मल वायु में स्पन्दन, आवर्त, विवर्त आदि भासते हैं वैसे ही ब्रह्मरूपी वायु में सृष…
  31. Verses 36–41जैसे महाकाश में अनन्तता, छिद्रता, शून्यता आदि धर्म हैं वे सब आकाशरूप हैं वैसे ही सृष्टि भ…
  32. Verse 42ऐसा कहते हैं। जैसे साम्प्रतिक अनन्यभूत परमात्मा में सृष्टिरूप परमात्मा का भान होता है वैस…
  33. Verses 43–64जब शब्द और उनके अर्थभूत सर्ग चिन्मय ही हैं तब वहाँ कार्य कर चुका शास्त्र भी जिस पर शासन क…