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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verses 36–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verses 36–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 36-41

संस्कृत श्लोक

इति संचिन्त्य सब्रह्मजगद्धारणया चिरम् । निमीलितदृशस्तस्थुस्ते चित्ररचिता इव ॥ ३६ ॥ अथैतद्धारणाबद्धचित्तास्ते तावदच्युताः । आसन्मासान्दशाष्टौ च यावत्ते तत्र देहकाः ॥ ३७ ॥ शुष्काः कंकालतां याताः क्रव्यादैश्चर्विताङ्गकाः । नाशमभ्याययुस्तत्र च्छायाभागा इवातपैः ॥ ३८ ॥ अहं ब्रह्मा जगच्चेदं सर्गोऽयं भुवनान्वितः । इति संपश्यतां तेषां दीर्घकालोऽभ्यवर्तत ॥ ३९ ॥ तानि चित्तान्यदेहानि दशैकध्यानतस्ततः । संपन्नानि जगन्त्येव दश देहानि वै पृथक् ॥ ४० ॥ इति तेषां चिदिच्छा सा संपन्ना सकलं जगत् । अत्यन्तस्वच्छरूपैव स्थिता चाकारवर्जिता ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे महाकाश में अनन्तता, छिद्रता, शून्यता आदि धर्म हैं वे सब आकाशरूप हैं वैसे ही सृष्टि भी परात्पररूप है उससे भिन्न नहीं हे । जैसे निद्रा आदि में स्पष्टरूप से उपलब्ध भी ये सब पदार्थ असत्‌मय ही है वैसे ही ये सृष्टि के पदार्थ सत्‌ से अनन्यरूप ही हैं । जैसे निद्राघन में स्वप्न और सुषुप्ति है वैसे शुद्ध सौम्य चिद्घन आत्मा में सृष्टि, प्रलय और स्थिति हैँ । जैसे मनुष्य एक स्वप्न से अन्य स्वप्न में स्थित होता है वैसे ही अजन्मा परमात्मा स्वसत्ता में एक सर्ग से अन्य सर्ग के रूप में स्थित होता है। जैसे स्वप्नानुभवों मे पृथिवी आदि से रहित स्वाप्नपदार्थ पृथिवी आदि से युक्त-सा प्रतीत होता है वैसे ही पृथिवी आदि से रहित भी यह निर्दोष ब्रह्माकाश पृथिवी आदि से युक्त-सा प्रतीत होता है। जैसे अनन्तरूप इस साम्प्रतिक परमात्मा में वर्तमान घट, पट आदि शब्द उनके अर्थ स्थित हैं वैसे ही अनन्य महाचैतन्य में भूत और भविष्यत्‌ सृष्टियाँ स्थित हैं