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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । पदार्था द्विविधाः सन्ति मूर्तामूर्ता जगत्त्रये । यत्र सप्रतिघाः केचित्केचिदप्रतिघा अपि ॥ १ ॥ तानिहाप्रतिघानाहुर्नान्योन्यं वेल्लयन्ति ये । तांश्च सप्रतिघानाहुरन्योन्यं वेल्लयन्ति ये ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

यह स्वप्नतुल्य सृष्टि अकारण ही है, ऐसा पीछे अनेक बार जो कह आये हैँ उस पर श्रीरामचन्द्रजी गेहूँ, धान आदि कार्य की भी कृषि, वृष्टि आदि कारण के बिना ही उत्पत्ति होगी यों उत्पत्ति-प्रसंग पर आशंका करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : मुनिवर, यदि परमपद से यह जगद्रूप ब्रह्म स्वप्न, संकल्प आदि के समान निष्कारण ही प्रवृत्त होता है तो अकारण ही सकल इच्छित पदार्थों की सिद्धि होने पर अन्य गेहूँ, धान आदि किसानों की कोई वस्तुएँ कभी, बीज, जोतने आदि के कारण के बिना ही क्‍यों नहीं होती ?

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक यौ सतहत्तरवाँ सर्ग कल्पना से कारण सहित किन्तु वस्तुस्थिति से (वास्तविकता से) अकारण यह जगत्‌ अज्ञान से स्वप्नतुल्य है और ज्ञान से ब्रह्म ही है, यह वर्णन |