Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
कस्मिंश्चित्प्राक्तनेनैव जगज्जालेऽभवद्द्विजः ।
तपोवेदक्रियाधारो ब्रह्मन्निन्दुरिति स्मृतः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
विज्ञानवादी के मत में भी अमूर्त ओर क्षणिक विज्ञान में मूर्त अक्षणिक की कारणता दुर्वच है, ऐसा
कहते हैं।
विज्ञानवादी का ज्ञान भी विशाल भित्ती आदि और अभित्तियाँ उनसे विलक्षण परमाणु आदिरूप
मुहुर्मुहु: उत्पन्न होकर ध्वंस होनेवाले अनन्त पदार्थो का उपादान कारण नहीं है