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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

यदि सप्रतिघं वस्तु वेल्लत्यप्रतिघात्मकम् । कथं संवित्तिमात्रेण पुंसः शैलो न वल्गति ॥ ८ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । विकासमथ संकोचमत्र नाली हृदि स्थिता । यदा याति तदा प्राणश्छेदैरायाति याति च ॥ ९ ॥ बाह्योपस्करभस्त्रायां यथाकाशास्पदात्मकः । वायुर्यात्यपि चायाति तथात्र स्पन्दनं हृदि ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पर तत्त्वदृष्टि से नाना अनानारूप सब कुछ आदि-अन्तरहित शान्त अद्वितीय ब्रह्म ही भासता है वहाँ पर कौन किसका कारण है ? न तो तब ज्ञानकाल में कुछ प्रवृत्त होता है और न कुछ निवृत्त होता है, एक अद्वितीय आदि अन्त विहीन चिदाकाशात्म ब्रह्म ही केवल निज स्वरूप में स्थित है। जब यथार्थ में अकारणता ही है और कारण की केवल कल्पना ही है तब कौन किसका किससे किस प्रयोजन के लिए किस अधिकरण में कारण होगा अथवा कौन किसका किससे किसलिए किसमें कारण न होगा ?