Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
कथमप्रतिघं नाम वेदनं प्रतिघात्मकम् ।
इमं देहं चालयति भारं भारहरो यथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ब्रह्म उभयात्मक (सकारण पदार्थरूप ओर अकारण पदार्थरूप) है तो आपने अकारण पदार्थता
पक्ष की ही क्यो स्थापना की ? इस आशंका पर कहते हैं।
यदि अज्ञानी की दृष्टि से ब्रह्म से अन्य (भिन्न) कहीं पर कुछ भी कदाचित् प्रतीयमान हो तो
कारणों के विकल्प से उसका संयोग ठीक है, मेरे उसका प्रतिपादन न करने में यही भाव है कि तत्त्वज्ञान
ही सप्रयोजन है । एकमात्र तात्त्विक दृष्टि में पक्षपात से मैंने उसकी (अकारण पदार्थता पक्ष की) स्थापना
की है दूसरा रहस्य कुछ नहीं है