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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

संविदप्रतिघाकारा यदि सप्रतिघात्मकम् । चालयेदचलिष्यत्तद्दूरमम्भो यदिच्छया ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म से अतिरिक्त तत्त्वज्ञानी नहीं है ऐसी संभावना कैसे करते हैं, क्योकि तार्किक ओर पामरजन व्रह्म नहीं हूँ “मैं ब्रह्मज्ञानी नहीं हूँ यों अपने मे ब्रह्मभिन्नता और अब्रह्मज्ञता का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं, ऐसी स्वयं आशंका कर उक्त अनुभव से ही तार्किक और अज्ञो की ब्रह्मता का समर्थन करते हैं। अज्ञान आदि सकल जगत्‌ के आरोप का अधिष्ठान जो चिन्मात्र है वही ब्रह्म है। और उसका “मेँ अज्ञ हू यों अनुभव करनेवाले तार्किक की आत्मा में वारण कदापि नहीं किया जा सकता, क्योकि अज्ञता प्रबोधरूप आत्मा के अन्दर भासित होती हे । यदि वैशेषिको द्रारा कल्पित यह आत्मा जड़ है तो वह आत्मा में अज्ञान का अनुभव कैसे करेगा अतः आत्मा अज्ञान का अधिष्ठान चिद्रूप है यह इसी अनुभव से सिद्ध हे । ओर जगत्‌ केवल अज्ञानात्मा ही है इसलिए उसका अंग हे । जैसे स्वप्न ओर सुषुप्ति दोनों निद्रा के अन्दर निद्रांगता को प्राप्त हुए केवलनिद्रारूप ही हैं उनका स्वरूप निद्रा से भिन्न नहीं है वैसे ही जगत्‌ का स्वरूप भी अधिष्ठान चिद्रूप से अतिरिक्त नहीं है। ज्ञानस्वभाव आत्मा में स्वभावविरुद्ध अज्ञान आरोप के बिना नहीं रह सकता, इसलिए अज्ञान आदि जगत्‌ के आरोप की अधिष्ठानता आत्मा में इसी अनुभव से सिद्ध है, यह अर्थ है