Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
कस्मान्न स्थावरं वस्तु प्रस्पन्द्यपि चमत्कृतम् ।
वस्तु जङ्गममेवेह स्पन्दि मात्रेव किं वद ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अध्यारोप ओर अपवाद अज्ञो की दृष्टि से हैं तत्त्वज्ञानी पुरूष अज्ञानियों को प्रबुद्ध करने के
लिए उनका अंगीकार करते हैं वैसे ही अज्ञानियों के संमत प्रधान, परमाणु आदि से जन्य कारण- भाव
का संभव भी वे ज्ञानी क्यो नहीं स्वीकार करते, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, अज्ञानियों के ज्ञानगोचर पृथिवी, जल, तेज, वायु आदिरूप
कार्य में उनके अवयवों की परम्परा की चरम सूक्ष्मतारूप परमाणु और सत्त्व आदि गुणरूप कारणों का
संभव होने पर जन्य पदार्थ अकारण क्यों है, अथवा अद्वितीय ब्रह्म का परिशेष कैसे है ? हे प्रभो, यह
मुझसे कहने की कृपा कीजिये