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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

नेह किंचिन्न नामास्ति वस्तु सप्रतिघं क्वचित् । सर्वदा सर्वमेवेदं शान्तमप्रतिघं ततम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानवाध्यता की अन्यथा उपपत्ति न होने के कारण भी जगत्‌ स्वप्नतुल्य ही है, इसलिए उनके लिए कार्यकारण-कल्पना का अवसर नहीं है, ऐसा कहते है । ज्ञानवाध्यता का अन्यथा संभव न होने से ही कल्पना के सिवा दृश्य की स्वप्नतुल्य स्थूलाकाररूप कोई दृश्यता नहीं हैं