Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
इह सप्रतिघानां तु दृष्टमन्योन्यवेल्लनम् ।
न त्वप्रतिघरूपाणां केषांचिदपि किंचन ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हम बीज और अंकुर आदि की कल्पनाप्रयूत कार्य-कारणता का निवारण नहीं करते, जो व्यवहार की
व्यवस्था करनेवाली है, किन्तु जगत् में सत्यता के स्थापन से तत्वज्ञान की व्यर्थता का प्रतिपादन
करनेवाले ब्रह्मातिरिक्त प्रधान, परमाणुआदि अश्रौत (श्रुति द्वारा प्रतिपादित) कारण, जिसकी विभिन्न
वादिर्यो ने कपोल कल्पना कर रक्खी है उसका निराकरण करते है जिससे कि जगत् की एकमात्र
ब्रह्मविवर्तता की सिद्धि से तत्वज्ञान से बाध होने पर कैवल्यसिद्धि हो इस आशय से श्रीवसिष्ठजी
उक्त शंका का समाधान करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अनादि व्यवहार में जिसने जिस जिस पदार्थ की जैसे
दृढाभ्यास से अटल (कल्पित कार्यकारणभाव बद्ध) कल्पना की वह उसको वैसे ही कार्य या कारणरूप
सेदेखता है। अन्यथा कल्पित कार्यकारणभाव को तोडने से व्यवहार में भी व्यावहारिक नियमों का अपलाप
होने पर कोई कल्पना ही नहीं होगी, अतः अभ्यास के बिना सबकी मुक्ति का प्रसंग आयेगा