Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सप्रतिघाप्रतिघयोः श्लेषो नास्ति बहिर्यथा ।
तथैवान्तरहं मन्ये शेषं कथय मे मुने ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी की बुद्धि के अनुसार जगत् को अन्यसा मानकर सृष्टि के आदि में कारण है ऐसा स्वीकार
करने पर भी यक्ष के अनुरूप बलि होती है इस न्याय के अनुसार मिथ्याभूत प्रपंच की मिथ्या माया ही
कारण होगी फिर भी वास्तविक अद्वैत की क्षति नहीं है, इस आशय से कहते है।
शुक्तिरिजत, मरुनदी, रज्जुसर्पं आदि पदार्थ अकारण ही हैँ । संवित् द्वारा उनका कारणजन्यत्वेन
कल्पना करने पर वे सकारण हैं, अन्यथा कल्पना करने पर अकारण हैँ यों मिट्टी से निर्मित गौरी और
गणेश की मातृता ओर पुत्रता के तुल्य कल्पना के अनुसार ही उसकी व्यवस्था है । संवित् की जैसे
कल्पना की जाती है वैसी ही अकारणता या सकारणता की प्राप्ति होती हे