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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 15

चौदहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग जगत्‌ की भ्रान्ति का बीज तथा स्वरूप अहंभाव है, इसके परिमार्जन से जगत्‌ के अभाव द्वारा शुद्ध परमात्मा के शेष रह जाने से कृतार्थता सिद्ध हो जाती है, यह वर्णन ।

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  1. Verse 1अहंभावचमत्कारमात्रादवृष्टिरिवाग्दुदात्‌' यह जो ऊपर कहा या है, इसमें उपपादकरूप से इन्द्र औ…
  2. Verse 2आकाश के वर्ण के सदृश आविर्भूत इस जागतिक भ्रम का अभिमानकर्ता अहंभाव ही आद्य मूल कहा गया है
  3. Verse 3वासनारूपी रस से सींचे गये अहंभावरूपी बीजकण से ब्रह्मरूपी पर्वत के ऊपर अव्याकृत आकाशरूपी ज…
  4. Verse 4इस वृक्ष के सभी तारे पुष्प समूह हैं, मेघमिहिकारूपी वन से ढके समस्त पर्वत इसके पल्लव हैं,…
  5. Verse 5अब अहंकार का महाजलकूप से तथा जगत्‌ का उसके कार्यश्रूत तरंग आदि रूप से वर्णन करते हैं / हे…
  6. Verse 6तारों के समूहरूपी सीकरों की मूसलाधार वृष्टि करनेवाला तथा आकाश के कारण अनन्त सरोवरों से पर…
  7. Verse 7इसमें चित्रलिखित रेखाओं की नाई तीनों लोक के जनसमूहरूपी रेखाएँ आविर्भूत हो रही हैं तथा सूर…
  8. Verse 8भूपीठरूपी दृढ़ समुद्रफेन के पिण्ड से युक्त, अनेक जीवों के कारण जलकाकों से समन्वित तथा उनक…
  9. Verse 9यह जरा- मरण ओर मोहादिरूपी तरगों के समूहरूप चमत्कार से परिपूर्ण है तथा उत्पत्ति ओर विनाशशी…
  10. Verse 10अब दूसरी रीति से जगत्‌ का वर्णन करते हैं / हे विद्याधर, तुम इस जगत्‌ को अहंकाररूपी पवन का…
  11. Verse 11पवन तथा उसके स्पन्द, जल और उसके द्रवत्व एवं अग्नि तथा उसकी उष्णता के सदृश यह अहंकार और जग…
  12. Verse 12परस्पर बीजता का वर्णन करते हैं / हे विद्याधर, अहंकार के अन्दर यह जगत्‌ तथा उस जगत्‌ के अन…
  13. Verse 13यही कारण है कि अहंकार के फरिमार्जन से जगत्‌ का परियार्जन हो जाता है, यह कहते हैं । जो मनु…
  14. Verse 14तत््वद्वष्टि स्रे अहंकार को असरूप देखना ही इसका परिमार्जन हैं / इसलिए हे विद्याधर, परमार्…
  15. Verse 15यह केसे, इस पर कहते हैं / सर्वत्र, व्याप्त, अनन्त, संकल्पों के उल्लेखो से शून्य ब्रह्म मे…
  16. Verse 16कारण रहते भी लोक में अवस्तु के लिए वह कुछ नहीं कर सकता, प्राकृत सर्ग आदि में तो कारण का स…
  17. Verse 17अहंभावादिरूप बीज के अभाव से यह जगत्‌ भी नहीं है और इस जगत्‌ के अभाव से कैवल्यरूपी निर्वाण…
  18. Verse 18इस प्रकार उपपत्ति में प्रतिष्ठित जगत्‌ ओर अहंकार के अभाव से बाह्यरूप, आलोक आदि संसार तथा…
  19. Verse 19जो नहीं है वह तो सर्वथा नहीं है ही अतः विक्षेपादि दुःखरहित शान्त ब्रह्मरूप ही तुम हो । हे…
  20. Verse 20बाह्य ओर आभ्यन्तर दुश्यप्रपंच के कल्पनारूपी कलंक से शून्य अतएव शुद्ध, शिव, शान्त, नित्य ई…