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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

भुशुण्ड उवाच । यत्राहंत्वं जगत्तत्र पूर्वमागत्य तिष्ठति । पराण्वन्तरपीन्द्रस्य त्रसरेणूदरे यथा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंभावचमत्कारमात्रादवृष्टिरिवाग्दुदात्‌' यह जो ऊपर कहा या है, इसमें उपपादकरूप से इन्द्र और त्रसरेणु की आख्यायिकाकी योजना करते हैं । भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, जहाँ पर अहन्ता रहती है वहाँ पर जगत्‌ पहले ही से (77) आकर ऐसे बैठा रहता है, जैसे त्रसरेणु के भीतर परमाणु के अन्दर इन्द्र का साम्राज्य आदि प्रपंच

सर्ग सन्दर्भ

चौदहवाँ सर्ग समाप्त पन्द्रहवाँ सर्ग जगत्‌ की भ्रान्ति का बीज तथा स्वरूप अहंभाव है, इसके परिमार्जन से जगत्‌ के अभाव द्वारा शुद्ध परमात्मा के शेष रह जाने से कृतार्थता सिद्ध हो जाती है, यह वर्णन ।