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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

अवस्तुन्येति सर्गादौ न संभवति कारणम् । अतोऽहंत्वादि नास्त्वेववन्ध्यासुत इव क्वचित् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

कारण रहते भी लोक में अवस्तु के लिए वह कुछ नहीं कर सकता, प्राकृत सर्ग आदि में तो कारण का संभव ही नहीं है । इसलिए वन्ध्या स्त्री के पुत्र की नाईं अहंभाव आदि कहीं पर हैं ही नहीं