Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अहंत्वसलिलस्येदं जगत्स्पन्द उदाहृतः ।
चिञ्चमत्करणस्वादुर्वासनाविसरद्रवः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अहंकार का महाजलकूप से तथा जगत् का उसके कार्यश्रूत तरंग आदि रूप से वर्णन
करते हैं /
हे विद्याधर, यह जगत् अहंकाररूपी जल का स्पन्द (विलास) कहा गया है। चिति के वैषयिक
सुखरूपी माधुर्य से परिपूर्ण वासनाओं का प्रसार ही इसका द्रव है