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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 15, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

अभावादुपपत्तिस्थादेवं जगदहंत्वयोः । रूपालोकमनस्काराः शान्तास्तव न चेतरत् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार उपपत्ति में प्रतिष्ठित जगत्‌ ओर अहंकार के अभाव से बाह्यरूप, आलोक आदि संसार तथा आभ्यान्तर मानसिक संसार सब तुम्हारे शान्त हो चुके । इन तीनों से अतिरिक्त हेय कोई दुःख अब तुम्हें नहीं है, अतः हे विद्याधर, तुम शान्त बैठे रहो