Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 149
एक सौ सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड़तालीसवाँ सर्ग॑ स्वप्न की सत्यता तथा असत्यता का हेतु तथा चित् की सर्वात्मता, एकता और शुद्धि से युक्त जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का वर्णन ।
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- Verse 1व्याध ने कहा : हे मुनिनायक, वासना के अनुसार चित् का वेदन ही स्वप्न है ओर जाग्रत् भी स्व…
- Verse 2अधिष्ठान चित् की सत्यता से अध्यस्त में सत्यता स्वतः असत्यता दोनों जगह तुल्य ही है, तो इस…
- Verse 3लेकिन मणि, मन्त्र ओर औषधियों से होनेवाली स्वप्नसंवित् मणि, मन्त्र आदि के योग्य पुरुषों म…
- Verse 4वहाँ दोनों जनों में ही काकतालीय न्याय ही एकमात्र आसया है दष्ट किसी भी नियामक का निरूपण नह…
- Verse 5हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) आदि की संवित् पूर्वजन्म की प्रवल उपासना के परिपाक से जन्यहोनेके कार…
- Verse 6यदि प्रश्न हो कि हिरण्यगर्भ की उक्त संवित् भी दूसरे पुरुष के उससे विरुद्ध सत्य संकल्प से…
- Verses 7–8ऐसी स्थिति में संवित्स्वतन्त्रता अक्षुण्ण ही है, ऐसा कहते है। कोई घट, पट आदि पदार्थ न कही…
- Verse 9स्वप्न संवित् की सत्यता काकतालीयवत् है ऐसा जो पहले कहा था, उसका उपपादन करते है । यह स्व…
- Verse 10इसी प्रकार जाग्रत् में प्रसिद्ध घट, पट आदि की संवित् भी काकतालीय ही है, क्योकि उनमें भी…
- Verse 11सृष्टि के आरम्भ में चिदाकाश का अविनश्वर भान ही जगत् हे । अतएव सूक्ष्म चिति ही वस्तुसत्ता…
- Verse 12इसलिए केवल सन्मात्र ही नियत सत्तावान् है उससे अतिरिक्त सबकी सत्ता अनियत हैं, ऐसा कहते है…
- Verse 13अतः एक सद् ब्रह्म ही सर्वात्मक (सर्वरूप) है उससे अन्य कुछ नहीं है, इसलिए उससे अतिरिक्त स…
- Verse 14इस प्रकार विचार करने पर स्वप्न भी कहीं किसी काल में सत्य और कहीं किसी काल में असत्य भी सं…
- Verses 15–16जगत् नामक आकारवती यह संवित्रूप भ्रान्ति भासित होती है यह स्वयं मैं भ्रान्ति हूँ, ऐसा कहत…
- Verse 17जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जमे हुए और कुछ पिघले हुए घृत के समान अभिन्न ही हैं, यह उपपादन…
- Verse 18हो ऐसा, इससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते हैं। जैसे जमा हुआ कड़ा घी ही कुछ पिघलता हे क…
- Verse 19इस प्रकार अविद्याकृत चिन्मात्ररूप एक सुषुप्ति ही घृतवत् सदा द्रष्टव्य है । सभी नामरूप के…
- Verse 20स्वप्न आदि के फल का नियम और अनियम भी उससे पथक् नहीं है, ऐसा कहते हैं। यहाँ न नियति है ओर…
- Verse 21अज्ञान से आवृत अनियन्त्रित चिति जाग्रत् और स्वप्न है, परिश्रम आदि निमित्त से नियन्त्रित…
- Verse 22यदि कोई शंका करे कि संवित् का पवन के समान नियमन करना अति दुष्कर है। उक्त संवित् का स्वप…
- Verse 23यदि कोई कहे कि बाह्य, घट, पट के आकार ही संवित् से अपना सम्बन्ध होनेपर संवित् की स्वाकार…
- Verse 24तो क्या सारा का सारा नियतिरूपी महल ढह गया ? ऐसी आशंका होनेपर नकारात्मक उत्तर देते हैं । य…
- Verse 25स्वप्न की सत्यतानियति तो सर्वत्र शात्रानुसार होती है, इसलिए काकतालीयवत् ऐसा हमने कहा है,…
- Verse 26मणि, मन्त्र, ओषध आदि रूपसे प्रयुक्त स्वप्नसत्यता-नियति तो जाग्रत् प्रतीति में भी तुल्य ह…
- Verse 27जाग्रत् और स्वप्न दोनों ही केवल चित्भान ही हैँ, अतएव इनमें विभिन्नता कैसी ? जाग्रत ओर स…
- Verses 28–29अतएव निद्राविहीन आत्मा में जाग्रत् और स्वप्न दोनों का ही व्यभिचार होने से अभाव ही है, ऐस…
- Verses 30–42ऐसी स्थिति में निद्राविहीन आत्मा की सुषुप्ति भी है ही नहीं, इस अभिप्राय से कहते हैं। निद्…