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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

सोऽत्र संपूजितस्तुष्टः सुप्तवान्भुक्तवांस्ततः । इदमङ्ग मया पृष्टो विमृश्य जनताक्रमम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि प्रश्न हो कि हिरण्यगर्भ की उक्त संवित्‌ भी दूसरे पुरुष के उससे विरुद्ध सत्य संकल्प से क्यो तिरस्कृत नहीं होती ? इस पर कहते है। हिरण्यगर्भ की संवित्‌ के सर्गादि निश्चय को कोई दूसरा अगर तिरस्कृत करता है तो उसमें पूर्वजन्म की उपासना के समय “मैं जगत्‌ का सर्जनहार हूँ” ऐसा प्रौढ निश्चय मृत्यु के समय में उद्भूत होकर “तद्धैतल्लोकजिदेव “* इस श्रुति से सिद्ध स्वलक्ष्य फलवाला कैसे होगा ? इससे सिद्ध है कि हिरण्यगर्भं की संवित्‌ के अविरोध से ही अन्य सिद्ध जनों का संकल्प उदित होता है, उसके विरुद्ध नहीं होता