Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
कदाचिच्चाजगामाथ गृहमुग्रतपा मम ।
मुनिर्मान्यो महाबोधो बुधोऽतिथितया तथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) आदि की संवित् पूर्वजन्म की प्रवल उपासना के परिपाक से जन्यहोनेके
कारण सत्यसंकल्परूप दृढ़ निश्वयवाली होकर जिस जिस निश्चय को अपनाती है वैसी वैसी अवश्य
हो ही जाती है, ऐसा कहते है ।
हिरण्यगर्भ की दृढ़ निश्चयात्मिका संवित् जिस जिस निश्चय को ग्रहण करती है पूर्वजन्म की उपासना
के फल के प्रभाव से उत्पन्न स्वभाव से वह वैसी वैसी हो जाती हे