Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verses 7–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verses 7–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
भगवन्भूरिबोधोऽसि जानासि जगतो गतीः ।
यस्माददृष्टक्रोधोऽसि सुखे गृह्णासि नो रतिम् ॥ ७ ॥
सुखदुःखान्युपायान्ति कर्मभिः कर्मशालिनाम् ।
शुभाशुभैः शरत्काले सस्यानीव फलार्थिनाम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में संवित्स्वतन्त्रता अक्षुण्ण ही है, ऐसा कहते है।
कोई घट, पट आदि पदार्थ न कहीं भीतर हैं और न कहीं बाहर हैं केवल सर्वतन्त्र स्वतन्त्र एकमात्र
संवित् जेसी इच्छा करती हे वैसे ही जगत् के रूपों से स्थित होती है । "यह स्वप्न सत्य है” इस प्रकारके
शास्त्र आदि प्रमाणां द्वारा किये गये निश्चय से अन्दर सत्य उदित हुई स्वप्नादिसंवित् तुरन्त सत्य ही हो
जाती है ओर "सत्य है या नहीं है" इस प्रकार के सन्देह से संशयग्ररत हो जाती है