Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
दुर्भिक्षावग्रहोत्पातं सर्वादि सममेव किम् ।
जनजालस्य फलति समाना कस्य दुष्क्रिया ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार जाग्रत् में प्रसिद्ध घट, पट आदि की संवित् भी काकतालीय ही है, क्योकि उनमें भी देश
और समय के भेद से अन्यथाभाव देखने में आता है, ऐसा कहते है ।
त्रैलोक्य में तत्-तत् (विभिन्न) पुरुषों की अपनी निज संवित् द्वारा चिर अभ्यस्त अर्थक्रिया आदि
से बद्धमूल घटादिस्वभाववाले भी सभी पदार्थ शीघ्र या चिरकाल में देश, काल तथा मुद्गर के आघातादि
प्रयत्न से अन्यथाभाव को प्राप्त होते हुए व्यभिचरित होते हैं, पूर्वनिश्चत स्वभाव का त्याग करते हैं