Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
अनन्तरं मुने ब्रूहि तत्तत्त्वं जागतस्य ते ।
किं वृत्तमुरुवृत्तान्तशतनिर्वाणसंसृतेः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
व्याध ने कहा : हे मुनिनायक, वासना के अनुसार चित् का वेदन ही स्वप्न है ओर जाग्रत् भी
स्वप्नविशेष ही है ऐसा यदि सिद्धान्त हे तो प्रातःकाल में देखा गया हाथीपर सवार होना इत्यादिरूप
कोई स्वप्न लाभ आदि फलका सूचक होने से सत्य है, उससे अन्य अरण्य में जाना, घूमना आदिरूप
स्वप्न किसी प्रकार के फल का सूचक न होने से असत्य है, यों स्वप्नदर्शनं की सत्यता और
असत्यता की कैसे उपपत्ति होगी ? इसी प्रकार हिरण्यगर्भ के मनोरथ से कल्पित सृष्टि अर्थक्रियाकारी
होने से सत्य है हमारे मनोरथ से कल्पित सृष्टि असत्य है यों जाग्रत जगत् के विषय में भी मेरा यह
महान सन्देह हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अड़तालीसवाँ सर्ग॑ स्वप्न की सत्यता तथा असत्यता का हेतु तथा चित् की सर्वात्मता, एकता और शुद्धि से युक्त जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का वर्णन ।