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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, Verses 15–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 149, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 149 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

अनाकारमनाख्येयमनाद्यमपकल्पनम् । इदं चिन्मात्रकाचस्य काचकच्यं जगत्स्थितम् ॥ १५ ॥ रूपमीदृशमेवास्य चिन्मात्रस्यास्त्यकृत्रिमम् । सर्वगस्य यदेतद्यद्यत्र वेत्यस्ति तत्र तत् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत्‌ नामक आकारवती यह संवित्रूप भ्रान्ति भासित होती है यह स्वयं मैं भ्रान्ति हूँ, ऐसा कहती है, इसमें यथार्थ संवित्‌ कौन है ? चिति ही चित्त बनकर जल में द्रव की तरह जो अपने में जगमगाती है साभास स्फुरित होती है, वही यह जगत्‌ है