Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 119
एक सौ सत्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठारहवाँ सर्म बगुले, जलकाक, मोर, वियोगीपथिक मछली ओर चातकों के चरित्र का वर्णन।
32 verse-groups
- Verse 1सहचर और सहचरियों ने क्रम से कहा : देखिये, यह बक यद्यपि प्रायः निर्गुण है तथापि इसमें एक ग…
- Verse 2अरे बगुले, तालाब में बैठा हुआ तू रंग से (सफेद पंखों से) हंस-सा मालूम पड़ता है । कौओं के स…
- Verse 3हे चतुरश्रेष्ठ, मछलियों को मारने में अत्यन्त प्रवीण जिन जलकौओं ने जलजीवों से परिपूर्ण गम्…
- Verse 4दुर्जनो ने लोकलिसा से स्वार्थत्िद्धि करना जल के कओ से सीखा; ये प्रकारांतर से कहते हैं इसी…
- Verse 5आकाश में यह सामने खड़ा बगुला, जिसने सुन्दर गर्दन ऊँची कर रक्खी है ओर सफेद सुन्दर पंख फैला…
- Verse 6को भलीभाँति जाननेवाली कोई तीरप्रदेशस्थित महिला बगलों के समान ही अन्यत्र चिरकाल तक विषयलम्…
- Verse 7फथिक की क्री कमल तोड़नेवाली महिलाओ को देख रहे अपने पति के (पथिक के) प्रति कहती हैं / हे प…
- Verse 8हे नरनाथ, पूर्वोक्त वचन कहनेवाली रूठी हुई अपनी प्रिया को मनाने के लिए यह बटोही मार्ग के प…
- Verse 9को पार्श्वचर इसी पथिक जोड़े के (सत्री-पुरुषों के) चर को ढिगाई के साथ कह रही वेश्या को राज…
- Verse 10बगुला, जलकाक ओर दूसरों पर घात करनेवाले मछुए आदि नित्य एक ही जगह रहते हैं, फिर भी मूर्ख और…
- Verse 11खंजन की चोच में पतंगा पंख फड़फड़ाता है, काँपता है। उसका पंख फड़फड़ाना क्यों है मानों वह प…
- Verse 12छोटी तलैया के तट के वृक्ष पर उल्लास के साथ वह चपल बगुला जब जोर से बोलता है तब थोड़े से जल…
- Verse 13बगुला, अजगर और जलकाक के पेट में बिना चवाये निगले हुये मछली आदि प्राणियों की जो चित्तस्थित…
- Verse 14जलचर मछली आदि जीवों को समीप में जलकौआ, बगुला, चील, बिल्ली, साँप देखने से जो भय होता है उस…
- Verse 15हे राजन्, फूलों की राशि से सुशोभित यहाँ सरोवर के तट के पेड़ के नीचे सामने भ्रमर रहने पर…
- Verse 16मोर क्षुद्राशय न होने के कारण इन्द्र से जल माँगता है, अत्यन्त उदार इन्द्र अक्षुद्रचित्तत्…
- Verse 17ये मोर बछड़े की तरह मेघो के पीछे-पीछे चलते हँ, मलिन मलिन का ही बच्चा हे, ऐसा अनुमान होता…
- Verse 18पथिक मृगो को देखकर सामने की वस्तुओं मे प्रिया के नेत्रं का चिन्तन करता हुआ कलसे चलनेवाली…
- Verse 19मोर भूमि का जल तक ग्रहण नहीं करता, किन्तु साँपों की जबरदस्ती खा डालता है, यह सर्पं की दुर…
- Verse 20मोर सनो के हृदय के समान स्वच्छ महान् सरोवर को छोड़कर मेघ द्वारा थूका हुआ जल पीता है, माल…
- Verse 21हे राजन् देखिये, ये मयूर वर्षा ऋतु के बच्चों की नाई नाचते हैं, जिनके पंखरूपी मेघ चमक रहे…
- Verse 22यहाँ पर मोतियों को देने के कारण सागर ही सुन्दर वन में वन के वायु से फैलनेवाले तथा चंचल चन…
- Verse 23हे चकित चातक, तुम्हारा वनभूमि में गर्मी के दिन अग्नि से दुषित (सदा अग्नि की संभावनावाले)…
- Verse 24हे मयूर, यह सागर के जल से भरा हुआ अतः आकाश में चढ़ने की इच्छावाले मेघ नहीं है, यह तो पर्व…
- Verse 25अनावृष्टि के समय भूमि का जल न पीनेवाले मयूर के आशय का क अनुचर वर्णन करता हैं / जिस मेघ ने…
- Verse 26थका : तो क्या मयूर अनुचितकारी है ? समाधान : नहीं, मेघ के पेट से निकला हुआ, स्फटिकसा स्वच्…
- Verse 27ही समापन होता है जैसे कि आत्मज्ञानशून्य मूर्खो का जन्मयापन होता है, यह भाव है
- Verse 28हे राजन्, यहाँ पर तालाब से कमल, नीलकमल, कुईं,सफेद कमल, भसींड, कमलनाल, रक्तकमल, पत्ते और…
- Verse 29इसके बाद इन कमल आदि के बोझों को क्यों ले जाती हो, यह पूछने पर उन्होंने पूछनेवाले को (मुझ…
- Verse 30तदुपरान्त प्रेमपूर्ण हृदयवाली, स्तनों के भार से नत (झुकी हुईं) तथा विविध हावभावों से मनोह…
- Verse 31वहाँ पर कड फएथिक अपनी प्रिया का स्मरण कर कहता हे / वह मेरी प्रिया जल से भरे मेघरूपी अन्धक…
- Verse 32हाय, भ्रमरश्रेणी तथा नीलकमलों से परिवेष्टित कमलरूप पानपात्र से (पीने के बर्तन-कटोरे से) उ…