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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

भ्रातर्मेघ महेन्द्रचापमुचितं व्यालम्ब्य कण्ठेगुणं नीचैर्गर्ज मुहूर्तकं कुरु दयां सा बाष्पपूर्णेक्षणा । बाला बालमृणालकोमलतनुस्तन्वी न सोढुं क्षमा तां गत्वा सुगते गलज्जललवैराश्वासयात्मानिलैः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश में यह सामने खड़ा बगुला, जिसने सुन्दर गर्दन ऊँची कर रक्खी है ओर सफेद सुन्दर पंख फैला रक्खे हैं, हंस ही है यों लोगों द्वारा निर्णीत हुआ, जब यह भूमि में कीचड़ से भरी छोटी तलैया में मछलियाँ पकड़ता है, तब लोग यह बगुला है, ऐसा निश्चय करते हैं