Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अस्मिन्महाप्रलयकालसमे वियोगे यो मां तयेह मम याति गृहं स कः स्यात् ।
नैवास्त्यसौ जगति यः परदुःखशान्त्यै प्रीत्या निरन्तरतरं सरलं यतेत ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चतुरश्रेष्ठ, मछलियों को मारने में अत्यन्त प्रवीण जिन जलकौओं ने जलजीवों
से परिपूर्ण गम्भीर जल के अन्दर बार-बार प्रवेश कर पहले (निगलने के समय) मछलियों से चोंचें
भर कर मछलियाँ खाई, वे ये कौए जिनके गले में भाग्यवश किसी कारण मरी हुई तिमि" जाति की
मछलियों के भक्षण से रोग उत्पन्न हो गया है, अत्यंत क्षुधासमय में (आक्रमण के समय में) तीर में
कतार बोधकर स्थित हुए भी, पंगु होने के कारण, अपने सामने तटपर आई हुई, अनायास पकड़
में आने योग्य मछलियों पर आक्रमण नहीं करते, यह बड़े आश्चर्य की बात हे