Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
दृष्टं श्मशानं तदनन्तभीमकरङ्ककंकालघनामगन्धि ।
माद्यच्छिवावायसकङ्कगृध्रपिशाचवेतालविरावरौद्रम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अनावृष्टि के समय भूमि का जल न पीनेवाले मयूर के आशय का क अनुचर वर्णन करता हैं /
जिस मेघ ने शरत् ऋतु में भी मयूर को जलधाराओं से तृप्त किया वह वर्षऋतु में भी तालाब
को न भरे ऐसा उसका जो चरित्र है, वह बालजनोचित (क्षुद्रोचित) है, उस महान् के योग्य नहीं है ।
उदारता के समय में भी की गई इस अनुदारता को देखकर पामरो द्वारा किये गये उपहास से वह सज्जन
दुःखी होगा, यह सोचकर मयूर सदा के लिए अपनी प्यास ही न बुझाने के लिए तैयार हो गया