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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 119, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

अत्रान्तरे झटिति चन्दनपङ्कशीताद्दीर्घादिवेन्दुशकलादशनिः सशब्दः । दृष्टो मया चितितलज्वलितो हुताशः क्षीराब्धिवाडवनिभोङ्गगतः स्वतल्पात् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

मोर क्षुद्राशय न होने के कारण इन्द्र से जल माँगता है, अत्यन्त उदार इन्द्र अक्षुद्रचित्तत्वरूप गुण से सन्तुष्ट होकर मोर की प्रसन्नता के लिये सारी पृथ्वी को जल से पूर्ण कर देता हे