Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 106
एक सौ चारवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पॉँचवाँ सर्ग चित् काही जाग्रत के तुल्य और चित् का ही स्वप्न के तुल्य भान होता है, इसलिए जाग्रत ओर स्वप्न में कोई अन्तर नहीं है, यह वर्णन ।
36 verse-groups
- Verse 1जग्रत् की पूर्वोक््त स्वप्नसमानता का विस्तार से वर्णन करने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करते…
- Verse 2यह जाग्रत् निरा स्वप्न है, जो कि जगत्रूप से त्यक्त न होता हुआ अज्ञानरूप ही है, मूलतः शिल…
- Verse 3स्वप्न भी ऐसा ही होता है अतः वही इसका ठीक-ठीक उदाहरण हैं, यह कहते हैं / इस विषय में विविध…
- Verse 4जैसे स्वप्न में यह असत् ही त्रैलोक्य अवभासित होता है वैसे ही इस जाग्रत् अवस्था में भौ अ…
- Verse 5जगत्-शब्द के अर्थ का (जगत् का) न तो जाग्रत में संभव है और न स्वप्न में ही संभव है, वस्त…
- Verse 6अपने आप होनेवाले चिदाकाश ने अन्धकार से आवृत आत्मरूप आकाश में पर्वत, नगर आदि का स्वरूप धार…
- Verse 7यह जगत् कुछ नहीं है (शून्य है), भास्यमान जगत् के शून्य होने से उसका भासक चित् का रूप भ…
- Verse 8जैसे स्वप्नावस्था में भासित हुआ त्रैलोक्य वास्तव में कुछ नहीं है, शून्य है वैसे ही जाग्रत…
- Verse 9हे महात्मन्, विविध प्रकार के गृह, उपवन आदि की निर्मितियों से शोभायमान स्वप्न मेँ आरम्भ अ…
- Verse 10ब्रह्म ही अत्यन्त विस्तृत शून्यरूप आकाश पहले बना ओर भूताकाश ही क्रमशःवायु आदि बनकर पर्वतस…
- Verse 11जैसे स्वप्न में मेघो, सागरं और पर्वतों की गर्जन आदि ध्वनि सोये हुए एक स्वप्नद्रष्टा पुरुष…
- Verse 12में उत्पन्न होता है वैसे ही उत्पन्न न हुआ भी यह जाग्रत-जगत् उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता ह…
- Verse 13जैसे स्वप्न में सोये हुए पुरुष का अपनी शयनभूमि का अननुभव उसकी असत्ता सिद्ध करता है वैसे ह…
- Verse 14स्वप्न जो असत् है वह शीघ्र ही संभव हो जाता है जैसे कि दिन ही रात्रि हो जाता है और असंभव…
- Verse 15स्वप्न में असंभव संभव हो जाता है जैसे कि आकाश मे जगत् का भान, अन्धकार ही महान प्रकाश बन…
- Verse 16प्रकाश ही अन्धकार बन जाता है क्योकि उल्लू आदि की नींद ऐसी देखी जाती है कि उसमें दिन ही स्…
- Verse 17स्वप्न में गड्डे में गिरने का अनुभव होने पर शयन भूमि ही गर्ताकाश (गड्ढा) बन जाती है। जैसे…
- Verse 18जैसे दो (कल का और आज का) सूर्य एक-से होते हैं जैसे दो युग्मज यानी जुडवे पुरुष एक-से होते…
- Verse 19एूवोक्त जाग्रत और स्वप्न की समता का खण्डन कर उसमे विलक्षणता दिखला रहे श्रीरामचन्द्रजी शका…
- Verses 20–25केवल इतने से ही जाग्रतू-जयत् की स्वप्न जग्रत् से विलक्षणता चिद्ध नहीं हो स्रकती, क्योकि…
- Verses 26–28जैसे जाग्रत् में मरकर अन्य जाग्रत् में उत्पन्न हुआ पुरुष पूर्वजाग्रत-प्रपंच में वह स्वप…
- Verse 29स्वप्न देखनेवाला जीव स्वप्न में मरकर जाग्रत में जागा हुआ कहलाता है ओर यहाँ (जाग्रत् में)…
- Verse 30इस प्रकार एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में स्थिति होने पर दूसरा स्वप्न ही पहले स्वप्न की अपे…
- Verse 31जाग्रत ओर स्वप्न दोनों ही उपन्यासमय (ग्रंथ के कथा के अर्थ के समान काल्पनिक) ही हैं यथार्थ…
- Verse 32इतीहाय्रमयों एला दीर्घा पाठ होने फर स्वप्न और जाग्रत् कु विलक्षण होने पर भी यह अर्थ है।…
- Verse 33स्थावर ओर जंगम समस्त प्राणी विचार करने पर चिन्मात्र के सिवा और क्या ठहरते हैं, कुछ भी नही…
- Verse 34है, उससे अतिरिक्त नहीं है
- Verses 35–36जैसे हमारे स्वप्न की सकल वस्तुएँ चित् के चमत्काररूप हैं वैसे ही जाग्रत की भी सब वस्तुएँ…
- Verse 37इसलिए अध्यारोपपक्ष में चिन्मात्र ब्रह्म ही जगत् के आकार से विभक्त है ओर अपवादपक्ष में तो…
- Verse 38जैसे मिट्टीमयपात्र मिट्टी से विहीन नहीं दीखता वैसे ही चिन्मयचेत्य (जगत्) चित्-शून्य (चि…
- Verse 39जैसे पत्थर का बना हुआ पात्र पत्थर-विहीन नहीं दीखता वैसे ही चिन्मय चेत्य (जगत्) भी चित्भ…
- Verses 40–41जैसे द्रवरूप जल द्रवहीन नहीं पाया जा सकता वैसे ही चिन्मय चेत्य चित्व्यतिरिक्त नहीं हो सकत…
- Verse 42स्पन्दमय (चलन-स्वभाव) वायु कदापि स्पन्दशून्य नहीं प्राप्त हो सकता वैसे ही चिन्मय चेत्य चि…
- Verse 43जो वस्तु जिससे बनी है उसके बिना वह कैसे प्राप्त हो सकती है । आकाश अशून्य कहाँ मिलता है ओर…
- Verse 44जैसे स्वप्न में घट, पट आदि पदार्थ चिदाकाशमय ही हे वैसे ही ये जगत् के पर्वत, नगर आदि एकमा…
- Verses 45–63हे सुन्दर, जैसे स्वप्न में प्रसिद्ध नगर, पर्वत, गृह आदि संविन्मय (चिन्मय) आकाश ही हैं वैस…