Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
वस्तुतस्त्वनयोर्भेदो न द्वयोः पयसोरिव ।
द्वयमप्येकमेवैतच्चिन्मात्रं व्योम निर्मलम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न भी ऐसा ही होता है अतः वही इसका ठीक-ठीक उदाहरण हैं, यह कहते हैं /
इस विषय में विविध नगरों से अलंकृत स्वप्न ही दृष्टान्त है, स्वप्न में जगत् का नामलेश भी
नहीं रहता फिर भी वह इसी प्रकार देदीप्यमान प्रतीत होता है