Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
नेदं नेदं तदित्येवं सर्वं निर्णीय सर्वथा ।
यन्न किंचित्सदा सर्वं तच्चिद्व्योमेति कथ्यते ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
एूवोक्त जाग्रत और स्वप्न की समता का खण्डन कर उसमे विलक्षणता दिखला रहे
श्रीरामचन्द्रजी शका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, जाग्रत् और स्वप्न मेँ तनिक भी अन्तर नहीं है, ऐसा जो आपने
कहा, वह ठीक नहीं है, क्योकि स्वप्न में तो तुरन्त ही स्वप्न का बाध करनेवाली जाग्रतप्रतीति होती
है, उसके देखने से मन में अपने आप ही स्वप्न की आभासता का अनुभव हो जाता है, अतः जाग्रत्
स्वप्न के तुल्य कैसे हो सकता है ?