Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verses 26–28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verses 26–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 26-28
संस्कृत श्लोक
इदमादावनुत्पन्नं कारणाभावतः किल ।
कारणेन विना कार्यं न हि नामोपपद्यते ॥ २६ ॥
यद्वोपपद्यते किंचित्तदकारणकोद्भवम् ।
यथास्थितं परं रूपमुद्भूतमिव लक्ष्यते ॥ २७ ॥
तद्यथास्थितमेवाङ्ग पूर्वरूपमवस्थितम् ।
भवत्यद्वयमेवाच्छं द्वयेनाप्युपलक्षितम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जाग्रत् में मरकर अन्य जाग्रत् में उत्पन्न हुआ पुरुष पूर्वजाग्रत-प्रपंच में
वह स्वप्न तथा असत् था इस प्रकार की प्रतीति को प्राप्त नहीं होता वैसे ही एक स्वप्न से दूसरे
स्वप्न को प्राप्त हुआ पुरुष उत्तर (बाद के) स्वप्न में जाग्रत् प्रतीति ग्रहण करता है । उत्तर स्वप्न
में जाग्रतुप्रतीति जैसे भ्रान्ति है वैसे ही पूर्वजाग्रत् में स्वप्नता और असत्ता का ग्रहण भी मूढताप्रयुक्त
(भ्रम) ही है । फिर स्वप्न में भी अन्य स्वप्नदर्शन का अनुभव करता हुआ स्वप्न का ही जाग्रतरूप
से अनुभव करता है इस प्रकार जाग्रत स्वप्न नाम की दोनों अवस्थाओं में जीव न स्वतः उत्पन्न
होता है और न मरता है किन्तु तत्-तत् (जाग्रत स्वप्न के) शरीरो मे अभिमान के ग्रहण और त्याग
द्वारा जन्म लेता है तथा मरता है