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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

निद्रायां विनिवृत्तायां यतो विश्वं प्रवर्तते । निवर्तते च यच्छान्तौ तच्चिदम्बरमुच्यते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न में गड्डे में गिरने का अनुभव होने पर शयन भूमि ही गर्ताकाश (गड्ढा) बन जाती है। जैसे स्वप्न में असत्यरूप ही जगत्‌ का इस तरह भान होता है वैसे ही जाग्रत का भी मिथ्या ही भान होता है । स्वप्नजगत्‌ एवं जाग्रत्‌-जगत्‌ दोनों में तनिक भी अन्तर नहीं है