Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verses 20–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verses 20–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 20-25
संस्कृत श्लोक
देशाद्देशान्तरप्राप्तौ यन्मध्ये संविदो वपुः ।
दूरतोऽर्धनिमेषेण तच्चिन्मात्रवपुः स्मृतम् ॥ २० ॥
विश्वं तन्मयमेवेदं यथा भूतं यथा स्थितम् ।
रूपालोकमनस्कारैर्युक्तमप्येवमीदृशम् ॥ २१ ॥
ईषदुन्मेषणादेतदन्यतामिव गच्छति ।
अनन्यरूपमपि सच्चिद्व्योम विमलाकृति ॥ २२ ॥
पश्यन्नेवेन्द्रियैरर्थान्नूनं निर्वासनाशयः ।
प्रबुद्ध एवैकघनः सुषुप्तावस्थितो भव ॥ २३ ॥
निर्वासनः शान्तमना वद व्रज पिबाहर ।
पाषाण इव संजीवो नित्यं सुघनमौनवान् ॥ २४ ॥
इदं न संभवत्येव दृश्यं पश्यसि यत्पुरः ।
मृगतृष्णाजलमिव द्वैतमिन्दाविवोदितम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल इतने से ही जाग्रतू-जयत् की स्वप्न जग्रत् से विलक्षणता चिद्ध नहीं हो स्रकती,
क्योकि भिन्न देशवाली जाग्रतूप्रतीति स्वप्नप्रतीति की बाधक नहीं हो सकती / स्वप्न-स्थान
में निद्रायुक्त स्वप्नवेहस्थ पुरुष स्वाप्न बन्धुबाधवों को देखता है स्वप्नदेह के निकृत्त होने पर
निद्रारहित जाग्रत्-देहस्थ होकर स्वप्न में देखे हुए बन्धु आदि की असत्ता का अनुभव करता
है / अन्य देश में अन्य देह से देखे गये पदार्थो का-देहान्तर और देशान्तर में अन्य का दर्शन
होने पर-अदर्शन उनका बाध नहीं कहा जा सकता / पूर्वजन्म के बन्धु-कान्धर्वो का इस जन्म
में दर्शन न होने से बाध भी तो है ही, इस प्रकार जाग्रत और स्वप्न में समता ही है, विषमता
नहीं है, इस आशय से श्रीवश्तिष्ठजी समाधान करते हैं /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : रघुवर, यह स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्न संसार में स्वप्न संसार के
अपने बन्धु-बान्धवों के साथ विहार कर स्वप्नदेह-निवृत्तिमय मृत्यु को प्राप्त होता है, स्वप्न संसार
में मरकर स्वप्न के प्राणियों से वियुक्त होकर जीव जाग्रत संसार में अनेकानेक सुखदुःख दशाओं,
भ्रान्तियों तथा रात्रि ओर दिन के विपर्यासो का अनुभव कर स्वाप्न शरीर का त्याग करता है । फिर
नींद टूट जाने के कारण निद्रा के अन्त में शयन देश में उत्पन्न होता है ओर जाग्रत्-देह से सम्बद्ध
होता है । तदुपरान्त ये स्वप्न संसार में मृत्यु को प्राप्त होकर (स्वप्न शरीर का त्याग करके) दूसरे
जाग्रन्मय स्वप्न को देखने के लिए पुनः जाग्रत्-शरीर से सम्बद्ध होता है वैसे ही जाग्रन्मय स्वप्न
देखनेवाला जाग्रत्संसार में मृत्यु को प्राप्त होकर दूसरे जाग्रन्मय स्वप्न देखने के लिए फिर पैदा
होता है