Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कीदृशं स्याच्चिदाकाशं तद्ब्रह्मन्ब्रह्म यत्परम् ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
जग्रत् की पूर्वोक््त स्वप्नसमानता का विस्तार से वर्णन करने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करते हैं /
चित्स्वभाव आत्मा अपनी कलनारूप अपने से अभिन्न स्वभाव जगदाकारका स्वयं अनुभव
करता हुआ स्थित है । अर्थात् स्वप्न में जिस प्रकार आत्मा अपने से अभिन्न अपनी कल्पनारूप
पुर, नगर आदि का अनुभव करता हुआ स्थित रहता है वैसे ही जगदाकार अपने स्वभाव का
अनुभव करता है, जो अपने से अनन्य (अभिन्न) है ओर अपनी ही कल्पना है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ चारवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पॉँचवाँ सर्ग चित् काही जाग्रत के तुल्य और चित् का ही स्वप्न के तुल्य भान होता है, इसलिए जाग्रत ओर स्वप्न में कोई अन्तर नहीं है, यह वर्णन ।