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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 85

17 verse-groups

  1. Verses 1–53शून्य हो गया होगा । मैं समझती हूँ, यद्यपि मेरा स्वामी अब शुष्क वृक्ष के समान स्थितिवाला ह…
  2. Verse 54इस रूप का क्यों परित्याग कर देना चाहिए, इस पर कहते हैं। यदि मैं इसी रूप से इसके पास जाती…
  3. Verses 55–56पहले ही तपस्वी के वेष से उसे क्‍यों नर्ही बोधित किया, इस पर कहते हैँ । अब मेरा स्वामी राग…
  4. Verses 57–75वह चूडाला ब्राह्मणकुमार कैसे बन गयी, यह बतलाते हैं। पूर्वोक्त अग्नि और चन्द्र की धारणारूप…
  5. Verses 76–81राज्य का परित्याग और मोक्ष के लिए तपस्या का आचरण - इन दोनों की अज्ञात दशामे प्रशंसा नहीं…
  6. Verses 82–106अतिथिपूजन देवार्चन से भी बढ़कर है, इसलिए अकेला अतिथिपूजन ही जन्मसाफल्य मे हेतु है, फिर आप…
  7. Verses 107–110प्रबलतर प्रारब्ध से तत्त्वज्ञानियों की भी विवेकमात्रा तिरोहित हो जाती है, इसलिए किसी समय…
  8. Verses 111–113युख-दुःखरूपता ही दृष्टान्त से बतलाते है । राजन्‌, तृप्ति आदि के साधन किसी पदार्थ से सुख उ…
  9. Verses 114–115यों ज्ञानी ओर अज्ञानी दोनो में प्रारब्ध फलभोग एक-सा होने पर भी राग-अरागजनित विशेष है ही,…
  10. Verse 116अब स्फटिक की अपेक्षा भी ज्ञानी में अधिक स्वच्छता होने से विशेष बतलाते हैं । राजन्‌, जैसे…
  11. Verses 117–121अज्ञानियों को सुख-दुःख घनरूप से प्राप्त होते हैं, यह जो पहले कहा था उसका वर्णन करते हैं।…
  12. Verses 122–138सबसे पहले सुखोत्पत्ति का प्रकार बतलाते हैं। चूडाला ने कहा: समीपस्थल में शरीर, चक्षु, हाथ…
  13. Verses 139–142अद्वितीय ब्रह्मभावना के कारण भेदशून्यत्व और बन्धशून्यत्वरूप से जाने गये जीव मेँ क्षोभविभ्…
  14. Verse 143तदनन्तर मेद, अस्थि आदि के अन्दर संचरण करनेवाले व्यानवायु की प्रेरणा से समस्त अंगों में वि…
  15. Verse 144यह जो आपने पहले कहा था, उसमें स्वभाव शब्दार्थ क्या है ? यों राजा पूछते हैं। राजा शिखिध्वज…
  16. Verse 145सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि के उत्पादन में उत्सुक ब्रह्म प्राणियों के प्राक्तन कर्मोकि अनु…
  17. Verses 146–148वर्तमान समय में घट आदि में स्वभाव का वैचित्र्य कारणसामग्री के वैचित्र्य से कदाचित्‌ हो सक…