Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 107–110
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 107–110 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 107,108
संस्कृत श्लोक
नारदोपि कथं ब्रह्मन् मदनस्खलितोऽभवत् ॥ १०७ ॥
चूडालोवाच ।
सर्वस्या एव राजर्षे भूतजातेर्जगत्र्त्रये ।
देवादेरपि देहोयं द्वयात्मैव स्वभावतः ॥ १०८ ॥
अज्ञमस्त्वथ तज्ज्ञं वा यावत्स्वान्तं शरीरकम् ।
सर्वमेव जगत्यङ्ग सुखदुःखमयं स्मृतम् ॥ १०९ ॥
तृप्त्यादिना पदार्थेन केनचिद्वर्धते सुखम् ।
आलोक इव दीपेन महाम्बुधिरिवेन्दुना ॥ ११० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रबलतर प्रारब्ध से तत्त्वज्ञानियों की भी विवेकमात्रा तिरोहित हो जाती है, इसलिए किसी समय
देहधर्मो के वशवर्ती वे हो ही जाते हैं, ऐसा कहते है।
चूडाला ने कहा : हे राजर्षे, तीनों जगत् में सभी भूतजाति का, देव आदि का भी यह शरीर स्वभावतः
दो रूपवाला ही हे हे प्रिय, इस जगत् में चाहे अज्ञानी हों या ज्ञानी । अपने विनाशपर्यन्त सभी शरीर
सुख-दुःखात्मक ही कहे जाते हैं