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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verse 145

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verse 145 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 145

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । देवपुत्रमहाज्ञोऽसि वेत्सि पूर्वां च तत्स्थितिम् । ज्ञायसे वचनादेव स्वभावो हि किमुच्यते ॥ १४५ ॥

हिन्दी अर्थ

सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि के उत्पादन में उत्सुक ब्रह्म प्राणियों के प्राक्तन कर्मोकि अनुसार जिस- जिस धर्मवाले जिस-जिस पदार्थ के रूप से अपने आप में स्फुरित होता है, उस उस पदार्थ का प्रलय तक उस उस धर्म से युक्त रहना ही स्वभाव शब्द का अर्थ है, यह कहते हैं। चूडाला ने कहा : प्रिय, सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि के उत्पादन के लिए उन्मुख हुआ ब्रह्म अपने आप में जिस घट, कुण्ड, पट आदि रूप से प्रस्फुरित हुआ था, उसी रूप से आज भी व्यवस्थित है