Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 139–142
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 139–142 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 139-141
संस्कृत श्लोक
जीवेनेदृग्विधेनैव यथा प्रथमसर्गतः ।
स्वयं संविदितो मार्गस्तेनैवाद्यापि गच्छति ॥ १३९ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
सुखसंचारयोग्यासु जीवे सरति नाडिषु ।
देवपुत्र भवत्येव तद्वीर्यच्यवनं कथम् ॥ १४० ॥
चूडालोवाच ।
जीवः क्षोभयति क्षुब्धः प्राणादिपवनावलिम् ।
संविदा ज्ञांशमात्रेण सेनामिव महीपतिः ॥ १४१ ॥
वातस्पन्देन मेदोऽन्तर्मज्जासारश्च संस्थितः ।
त्यजत्याशु प्रसौगन्ध्यं रजः पत्रफलादिकम् ॥ १४२ ॥
हिन्दी अर्थ
अद्वितीय ब्रह्मभावना के
कारण भेदशून्यत्व और बन्धशून्यत्वरूप से जाने गये जीव मेँ क्षोभविभ्रम हो ही कैसे सकता है (तव
जीव में क्षोभविभ्रम आया कहाँ से 2 इस प्रश्न पर कहते हैं ।) हे प्रिय, इस प्रकार के कल्पित प्रथम
जीवात्मा हिरण्यगर्भ ने ही "सब जीवों के रूप में यों मे संसारी होऊँगा एवं अपने तत्त्वज्ञान से मैं क्रमश:
मुक्त भी हो जाऊँगा" इस तरह की अपनी कल्पना से बन्ध ओर मोक्षमार्ग की कल्पना कर आदि सर्ग से
जो प्रथा चलाई है, उसीका यह व्यष्टि जीव भी अनुकरण करता है हे देवपुत्र, सुखपूर्वक संचरण करने
योग्य नाडियों में जब जीव संचरण करता है, तब उसका वीर्य गिरता ही कैसे है ? अर्थात् इस सामान्य
प्रश्न के व्याज से प्रकृत में नारदजी का वीर्यक्षरण कैसे हुआ ? यह विशेष प्रश्न पूछा गया । चूडाला ने
कहा : राजन्, स्त्रीपिण्ड के अवलोकन के बाद रागवासना के उद्बुद्ध हो जाने के कारण क्षुब्ध हुआ जीव,
सेना को राजा के समान, अधिष्ठानभूत भोक््तृचैतन्य की सम्मतिमात्र से प्राण आदि वायुओं को क्षुब्ध कर
देता है