Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
सकाशमस्य गच्छामि बोधं दातुमनुत्तमम् ।
बालेयं मम कान्तेति मदुक्तं न करोत्यलम् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस रूप का क्यों परित्याग कर देना चाहिए, इस पर कहते हैं।
यदि मैं इसी रूप से इसके पास जाती हूँ तो यह बाला मेरी कान्ता हे, यह समझकर मेरा कहना
अच्छी तरह नहीं करेगा, इसलिए तपस्वी के रूप से सामने जाकर क्षणभर मेँ ही पति को बोधित
करती हूँ