Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 146–148
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 146–148 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 146,147
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
आद्यसर्गे यथा सद्यः स्फुरितं ब्रह्म ब्रह्मणि ।
घटावटपटाद्यात्म तथैवाद्यव्यवस्थितम् ॥ १४६ ॥
काकतालीयवद्वारिबुद्बुदोत्पत्तिनाशवत् ।
घुणाक्षरवदुच्छूनं तं स्वभावं विदुर्बुधाः ॥ १४७ ॥
अस्मिन्स्वभाववशतो जगति प्ररूढे देहा भ्रमन्ति परितो विविधा विकाराः ।
प्रक्षीणवासनतया न भवन्ति केचिद्भूयो भवन्ति च पुनस्त्वितरे घनास्थाः ॥ १४८ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्तमान समय में घट आदि में स्वभाव का वैचित्र्य कारणसामग्री के वैचित्र्य से कदाचित् हो
सकता है, परन्तु सृष्टि के आरम्भ मे तो कारणसामग्री का निरूपण कर ही नहीं सकते, इसलिए
(तालवृक्ष के नीचे कौए के आगमनकाल में ही वैवव्श तालफल का गिरना ओर उससे तत्काल उसका
मर जाना जैसे अदृष्ट-जनित है, वैसे ही, वह सब आद्यवेचित्रय अद्रष्टअधीन है, इसे बतलाने के लिए
ही आदि सर्ग का यहाँ कथन किया गया है, इस आशय से कहते हैं।
काकतालीय न्याय के सदुश या जल में बुलबुलों की उत्पत्ति ओर विनाश के सदृश या घुणाक्षर
(घुन के कारण लकड़ी आदि पर बने हुए अक्षरों के समान चिह्न) के सदृश सर्गारम्भ में घट, पट आदि
चित्र-विचित्र पदार्थों के रूप में जिस किसी वस्तुविशेष से ब्रह्म प्रस्फुरित हुआ, उसीको विद्वान् स्वभाव
कहते हैं () । उक्त अनिर्वचनीय स्वभाव के बल से उत्पन्न हुए इस जगत् में अण्डज आदि चार प्रकार
(70) इस श्लोक में वर्तमानकालिक प्रत्येक वस्तु में जो नियत स्वभाववैचित्र्य है, उसमें सामग्री
की इयत्ता का निरूपण नहीं कर सकते, इस अभिप्राय से “वारिबुद्बुद” यह दूसरा दृष्टान्त दिया गया
है । अथवा मायारूप होने से वैचित्रयोत्पत्ति आकस्मिक है, इस अभिप्राय से घुणाक्षर का तीसरा
दृष्टान्त दिया गया है ।
के विविध विकारात्मक जो देह यत्र तत्र चारों ओर घूम रहे हैं, उनमें कोई ज्ञानवान् देह समस्त वासनाओं
के क्षीण हो जाने के कारण फिर जन्म धारण नहीं करते ओर अज्ञानयुक्त देह तो फिर जन्म-धारण
करते हैं, क्योकि अज्ञानी भोगों में ही दृढ़ आस्था रखते हैं