Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 82–106
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 82–106 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 82-106
संस्कृत श्लोक
जीवितं याति साफल्यं स्वमभ्यागतपूजया ।
देवादप्यधिकं पूज्यः सतामभ्यागतो जनः ॥ ८२ ॥
तत्कस्त्वं कस्य पुत्रस्त्वं किमायातोऽस्यनुग्रहात् ।
एतन्मे संशयं छिन्धि विमलेन्दुसमानन ॥ ८३ ॥
ब्राह्मण उवाच ।
राजन्मे शृणु वक्ष्यामि यथापृष्टमखण्डितम् ।
को नाम परिपृच्छन्तं विनीतं वञ्चयेत्पुमान् ॥ ८४ ॥
अस्त्यस्मिञ्जगतीकोशे शुद्धात्मा नारदो मुनिः ।
पुण्यलक्ष्म्या मुखे कान्ते कर्पूरतिलकोपमः ॥ ८५ ॥
स कदाचिन्मुनिर्देवो गुहायां ध्यानमास्थितः ।
तत्र हेमतटे गङ्गा वहत्युरुतरङ्गिणी ॥ ८६ ॥
मेरुलक्ष्म्यां स्फुरद्रूपा भान्ति हारलता यथा ।
एकदा नारदमुनिर्ध्यानान्ते स सरित्तटे ॥ ८७ ॥
ध्वनद्वलयमश्रौषील्लीलाकलकलारवम् ।
किमेतदित्यसौ किंचिज्जातप्रायकुतूहलः ॥ ८८ ॥
हेलयालोकयन्नद्यामपश्यल्ललनागणम् ।
रम्भातिलोत्तमाप्रायं निर्यातं जललीलया ॥ ८९ ॥
क्रीडन्तं त्यक्तवसनं देशे पुरुषवर्जिते ।
काञ्चनाम्भोजमुकुलसंकाशैः स्तनमण्डलैः ॥ ९० ॥
परिवेल्लितमन्योन्यं फलकान्तं द्रुमं यथा ।
द्रुतहेमरसापूरनिर्भराभोगभासुरैः ॥ ९१ ॥
कुर्वन्तमुरुभिः काममन्दिरस्तम्भसंचयम् ।
निर्मलीकृतचन्द्रेण व्याप्तां व्योमविलासिनीम् ॥ ९२ ॥
लावण्यरसपूरेण तर्जयन्तमिवापगाम् ।
प्राकारैरमरोद्यानरथचक्रैर्मनोभुवः ॥ ९३ ॥
उत्पथार्पितगङ्गाम्बु नितम्बतटसेतुभिः ।
सर्वत्र दृष्टसर्वाङ्गं विश्वरूपमिव स्थितम् ॥ ९४ ॥
प्रतिबिम्बितसर्वाङ्गमन्योन्यादर्शतां गतम् ।
कालकल्पतरोर्वर्षविटपात्पक्षपल्लवात् ॥ ९५ ॥
विविधर्तुलताजालाद्दिनश्रीकलिकाकुलात् ।
आलोकपुष्परजसो जाताद्गगनकानने ॥ ९६ ॥
स्फुरज्जलखगप्रोतात्सप्ताब्ध्येकालवाडकात् ।
स्तनस्तबकवृन्देषु स्पर्धयातिरसान्वितम् ॥ ९७ ॥
उद्धृत्योद्धृत्य संपूर्णदलिताम्भोजपल्लवम् ।
आलोलालककेशाक्षितारकादिमधुव्रतम् ॥ ९८ ॥
अमृतापद्विघाताय कोशसंचयकारिभिः ।
दुष्प्रापे भूतसंघानां विकसत्कनकाम्बुजे ॥ ९९ ॥
पद्मिनीपल्लवाच्छन्ने गुप्ते मेरोर्गुहान्तरे ।
शीतले स्वर्धुनीतीरे तोयोन्मृष्टमले सुरैः ॥ १०० ॥
चन्द्रबिम्बकलापूरमेकत्रैवोपसंहृतम् ।
स्त्रैणमालोक्य तत्कान्तं सहसैव मनो मुनेः ॥ १०१ ॥
अनाश्रितविवेकांशं बभूवानन्दितं स्फुरत् ।
आनन्दवलिते चित्ते क्षुब्धे प्राणानिले स्थिते ॥ १०२ ॥
बभूव तस्य हृष्टस्य मदनस्खलितं तदा ।
फलं रसापूर्णमिव ग्रीष्मान्त इव तोयदः ॥ १०३ ॥
प्रत्यग्रपादपश्छिन्नलतावृन्त इवोत्तम ।
अवश्यायकणस्पन्दी शशाङ्क इव वा मुनिः ॥ १०४ ॥
विसं द्विधापातमिव गलत्साररसोऽभवत् ॥ १०५ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
तादृशोऽपि बहुज्ञोपि जीवन्मुक्तोऽप्यसौ मुनिः ।
निरिच्छोऽपि निरागोपि न किंचिदुपमोऽप्यलम् ।
सबाह्याभ्यन्तरं नित्यमाकाशविशदोपि च ॥ १०६ ॥
हिन्दी अर्थ
अतिथिपूजन देवार्चन से भी बढ़कर है, इसलिए अकेला अतिथिपूजन ही जन्मसाफल्य मे हेतु है,
फिर आपकी पूजा में तो मुझे दोनों की प्राप्ति एक साथ हो गयी, अतः मेरा जीवन तो सफल है ही, इस
आशय से कहते हैँ ।
अपने निकट आये हुए अतिथि की पूजा से जीवन सफल हो जाता है, क्योकि सज्जनं को
अभ्यागत जन देवता से भी अधिक पूज्य हैं । हे विमलचन्द्र के तुल्य मुखवाले, मेरे द्वारा समर्पित पूजा
ग्रहण के बाद, आप मेरे इस सन्देह को दूर कीजिये किं आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं और इस दीन
के ऊपर दया करके कहाँ से किसलिए आये हैं ? ब्राह्मण ने कहा : हे राजन्, जैसा आपने मुझसे
पूछा है वह सब मैं आपसे कहता हूँ, आप सुनिये । भला ऐसा कौन पुरुष है, जो एक विनम्र प्रश्नकर्ता
को ठगे - धोखा दे। पुण्यलक्ष्मी के कमनीय मुख में सुगन्धित कर्पूर के तिलक के सदृश गौरांग
शुद्धात्मा नारद मुनि इस जगती कोश में है । वह देवमुनि (नारद) सुमेरु पर्वत की गुहा मेँ किसी समय
ध्यानावस्थित थे । वहीं सुमेरुतट में विशाल तरंगवाली गंगाजी बहती हैं । जो मेरु के सौन्दर्य से
प्रकाशमान रूपवाली गंगा हारलता की नाई भासित होती है । उसी गंगा नदी के तट पर एक समय
ध्यान के अन्त में नारदमुनि ने शब्द कर रहे कंकणों से युक्त जलक्रीडा की कोलाहल ध्वनि सुनी
ओर यह क्या सुनाई दे रहा है, यों कुछ कौतूहल से युक्त हो गये । कौतुक से नदी की ओर देखते
हुए उन्होने जलसेचनादि क्रीडा करके जल से निकले हुए रम्भा, तिलोत्तमा आदि ललनाओं का
(अप्सराओं का) समूह देखा । स्वर्णकमल के कुंडलों के सदश स्तनमण्डलों से अलंकृत वह पुरुषरहित
प्रदेश में वस्त्र छोडकर क्रीडा कर रहा था । परस्पर एक दूसरे से मिल जाने के कारण वह फलों से
सुशोभित वृक्ष की नाई, प्रतीत हो रहा था, पिघले हुए सुवर्णरस के प्रवाहातिशय के सदृश
कान्तिरंस्थान से प्रकाशमान जंघाओं से अपने काममन्दिर के लिए मानो खम्भों का संचय कर रहा
था । वह अपने जल की निर्मलता से निर्मल बनाये गये चन्द्रमा से सर्वत्र व्याप्त व्योमविलासिनी
मन्दाकिनी को भी अपने देहलावण्यरसप्रवाह से मानों तिरस्कृत कर रहा था । नन्दनवन में कामदेव
की क्रीडा के साधनभूत रथ के चक्रभूत नितम्बतटरूप सेतुओं से प्रवाह का निरोध हो जाने के कारण
वह गंगाजल को भी उलटे मार्ग में पहुँचा रहा था। उस यूथ में विद्यमान प्रत्येक अप्सरा इतनी निर्मल
थी कि एक दूसरे के लिए दर्पण बन गयी थी । अतएव उनके समस्त अंग चारों ओर एक दूसरे में
प्रतिबिम्बित हो गये थे सभी जगह उनके समस्त अंग दिखाई पडते थे । इसलिए “सर्वतः पाणिपादं
तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम्" इसमें प्रसिद्ध कालात्मा भगवान् से उत्पन्न विश्वरूप से वह स्थित था ।
समस्त संकल्पित फलों का दाता होने से गीतोक्त कालात्मा भगवान् का कल्पतरूरूप से वर्णन करते
हैं। कालात्मारूपी कल्पतरु के प्रभव आदि साठ संवत्सर ही शाखा हैं, पक्ष ही पल्लव हैं, विविध ऋतु
उसकी लताएँ हैं, दिनश्री उसकी कलिकाएँ हैं, आलोक ही कुसुम रज हैं, गगनकानन में (नन्दन वन
में) वह उत्पन्न है, वह चमकीले जलमय शरीरवाले देवरूप पक्षियों से चारों ओर व्याप्त है, सात
समुद्र ही उसकी क्यारियाँ हैं, ऐसे कल्पतरूरूप व्यापक विष्णु से उत्पन्न विश्वरूप-सा वह ललनागण
स्थित था | एक दूसरे के स्तनरूपी पुष्प गुच्छों में तथा कमलमुकुलों में समान सौन्दर्य का अनुभव
होने के कारण उत्पन्न स्पर्धा से नालवण्ड से उखाड़-उखाड़ कर हिलाने के कारण अतिरसपूर्ण
कमल-पल्लवों को उस यूथ ने विदलित कर दिया था | उसके मुखरूप कमलों में चंचल लट,
दीर्घकेश, अक्षितारे तथा ललाट में गुँथे हुए नीलमणि भ्रमररूप से राजित थे। अमृतनिधि का संचय
करना ही जिनका स्वभाव है, ऐसे देवताओं द्वारा अमृत का अपहरण करनेवाले राहु आदि द्वारा -
सम्भावित विपत्ति का विनाश करने के लिए एकान्त सुमेरुगुहा के अन्दर; जो गुहा साधारण प्राणि
की अगम्य, खिल रहे सुवर्ण कमल के सदृश सुशोभित, पद्चिनी के पल्लवो से ढकी, शीतल गंगाजी
के किनारे पर विद्यमान तथा उसके जल से क्षालितमल थी; - मानों एकत्र बटोरे गए चन्द्रबिम्ब की
कलाओं के पुंजरूप से स्थित उन सुन्दर स्त्रियों का अवलोकन कर तत्काल ही मुनि का मन उनमें
आसक्त हो गया ओर विवेक की मात्रा का परित्याग कर प्रमत्त हो स्फुरित होने लगा । हे राजन्, जब
मुनि का चित्त आनन्द से सराबोर हो गया और चित्तविकृति के कारण प्राणवायु में क्षोभ हुआ, तब
उस हष्टचित्त नारद का वीर्य उस प्रकार स्खलित हो गया, जिस प्रकार रस से परिपूर्ण फल ग्रीष्म
की समाप्ति में मेच तथा विच्छिन्न शाखा-मूल वाला नवीन वृक्ष अपने स्थान से स्खलित हो जाता
हे । जल कण बरसानेवाले चन्द्रमा के सदृश वह मुनि उस प्रकार गलित शुक्र हुए, जिस प्रकार द्विधा
खण्डित मृणालतन्तु गलितशुक्र (सार) होता है राजा शिखिध्वज ने कहा : हे ब्रह्मन्, नारदजी
समस्त लोक में विख्यात भी हैं, सर्वज्ञ भी हैं, जीवन्मुक्त भी हैं, निरीह भी हैं, रागरहित भी हैं,
मुनियो मे उनकी बराबरी का कोई है भी नहीं, बाहर और भीतर आकाश के सदृश विशद भी हैं, फिर
ऐसे मुनि दर्शनमात्र से विकृतचित्त होकर स्खलित वीर्य केसे हुए