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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 122–138

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 122–138 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 122-138

संस्कृत श्लोक

अत्युदारमतीवाच्छं बह्वर्थं वचनं तव । श्रोतुं तृप्तिं न गच्छामि मयूरोऽभ्ररवेष्विव ॥ १२२ ॥ चूडालोवाच । स्वोत्पत्तिकारणं हृद्यं लब्ध्वा कायाक्षिपाणिभिः । सुखसंविदियं बाला नूनमुल्लसति स्वतः ॥ १२३ ॥ हृद्गता क्षोभमायाता जीवं कुण्डलिनीगतम् । जीवस्य नियता नाड्यः पृथग्देहे स्थितिं गताः ॥ १२४ ॥ प्राणावपूरिता नाडीर्जीव आक्रामति स्फुरन् ॥ १२५ ॥ संस्पर्शैकप्रबुद्धात्मा रसो द्रुमलता इव । सुखप्रबोधसंचारे दुःखबोधागमे तथा ॥ १२६ ॥ जीवस्य नियता नाड्यः पृथग्देहस्थितिं गताः । सुखिनः प्रस्फुरत्येषा धीरताशु न दुःखिनः ॥ १२७ ॥ ते हि मार्गाः सुवेषस्य कुवेषस्य न ते शुभाः । यावत्प्रमाणं जीवोऽयं संशाम्यत्यपरिस्फुरन् । तावत्प्रमाणमेवैनं मुक्तं मुक्तमवेहि वै । यावत्प्रमाणमधिकं स्फुरति क्षुब्धमारुतम् । तावत्प्रमाणमेवैनं बद्धं बद्धमवेहि मे ॥ १२८ ॥ सुखदुःखकलास्पन्दो बन्धो जीवस्य नेतरः । तदभावे हि मोक्षः स्यादिति द्वेधा व्यवस्थितिः ॥ १२९ ॥ सुखदुःखदशे यावदानीते नेन्द्रियैः शठैः । तावत्सुखसमः सौम्यो जीवस्तिष्ठति शान्तवत् ॥ १३० ॥ सुखमालोक्य वा दुःखमक्षातीतश्चलद्वपुः । समुल्लसति जीवोऽन्तर्दृष्ट्वेन्दुमिव तोयधिः ॥ १३१ ॥ जीवः क्षुभ्यति दृष्टेन संविदांग सुखादिना । आमिषेणेव मार्जारो मौर्ख्यमेवात्र कारणम् ॥ १३२ ॥ शुद्धेन बोध्यबोधेन स्वात्मज्ञानमयात्मना । सुखदुःखादि नास्तीति तेनासौ याति सौम्यताम् ॥ १३३ ॥ न तत्सुखादि नो तन्मे मुधा चायमहं स्थितः । इति जीवः प्रबुद्धो हि निर्वाणं याति शाम्यति ॥ १३४ ॥ सुखाद्यवस्त्वतद्रूपमित्यन्तर्बोधसंविदा । न तदुन्मुखतां याति जीवः शाम्यति केवलम् ॥ १३५ ॥ सर्वमेव चिदाकाशं ब्रह्मेति घननिश्चये । स्थितिं याते शमं याति जीवो निःस्नेहदीपवत् ॥ १३६ ॥ दीपवच्छममायाति सुखादिस्नेहसंक्षये । सर्वमेवमिति ज्ञानाज्जीवोऽद्वित्वविभावनात् ॥ १३७ ॥ सर्वमाकाशमेवेति बुद्ध्वा क्षोभं न गच्छति । जीवस्यानेन शून्यस्य कः किल क्षोभविभ्रमः ॥ १३८ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले सुखोत्पत्ति का प्रकार बतलाते हैं। चूडाला ने कहा: समीपस्थल में शरीर, चक्षु, हाथ आदि साधनों से तथा दूर स्थान में अनुमान आदि साधनों से अपनी उत्पत्ति में कारणभूत अभीष्ट वस्तु का लाभ कर अपने व्यापकस्वरूप को न जाननेवाली यह बाला सुखसंवित्ति अपने आप ही उल्लसित होती है । बुद्धि में अवस्थित आत्मसुखसंतवित्ति बुद्धि के क्षोभ से स्वयं क्षुब्ध होकर कुण्डलिनीगत जीव के प्रति स्वयं ही चिनगारी के सदृश आर्विभूत हो जाती है । जीव के लिए देह में अवस्थित नाडियाँ पृथक्‌ रूप से नियत है । प्राण से पूरित हुई उन नाड़ियों के अन्दर, विषयस्पर्श से प्रबुद्ध हुआ स्फुरणशील जीव उस प्रकार प्रविष्ट हो जाता है, जिस प्रकार मूल में सींचा गया जल नाली द्वारा समस्त द्वुमलताओं के अन्दर प्रविष्ट हो जाता हे । सुखसंवित्ति के संचरण में तथा दुःखसंवित्ति के आगमन में देह में विद्यमान नाड़ीमार्ग अलग-अलग ही जीव के लिए नियत हैं, एक नहीं । निरन्तर सुखानुभव करनेवाले राजा आदि में यह स्वस्थता जैसी स्फुरित होती है, वैसी दुःखानुभव करनेवाले पुरुष मे स्फुरित नहीं होती। ठीक ही है, लोक में भी देखा जाता है - शोभन वेषवाले राजा आदि के लिए कपूर, चन्दन आदि से सुगन्धित जल से सीचे गये जो मनोहर मार्ग होते हैँ वे अशोभन वेषवाले निम्न श्रेणी के जीवों के लिए नहीं होते। जिस समय यह जीव उन तरलतर नाडी मार्गो मे प्रविष्ट न होकर अस्फुरणशील हो जाता है, उस दशा में ही सर्वविध प्रपंच दुःखों से निर्मुक्त इसे मुक्त जानिये । ओर जब तक तरलतर नाडी मार्गो मे प्रविष्ट होकर क्षुब्ध-प्राण हो खूब स्फुरित होता रहता है तभी तक सर्वविध प्रपंच दुःखों से बद्ध इसे बद्ध जानिये । राजन्‌, सुख और दुःख के अनुभव के लिए चित्त का बाहर जो स्पन्दन है वही जीव का बन्ध है, दूसरा नहीं, इसलिए इस स्पन्द का अभाव हो जानेपर जीव का मोक्ष हो ही जायेगा, यों संसरण ओर असंसरण द्वारा बन्ध और मोक्ष की दो तरह से व्यवस्थिति है, यह मैंने कहा । इन शठ इन्द्रियों द्वारा जब तक सुख ओर दुःख की अवस्था लायी नहीं जाती तब तक जीव शान्त-सा सुखपूर्णं ओर सौम्य रहता है । सुख ओर दुःख को देखकर यह स्वप्रकाशात्मा जीव चंचलरूप होकर उस प्रकार भीतर उल्लसित हो उठता है, जिस प्रकार चन्द्र को देखकर समुद्र । हे प्रिय, इस सुख आदि की सामग्री से या सुख-साधन धन आदि में प्रियत्वज्ञान से जीव, मांस से बिल्ली की नाई, जो क्षुब्ध हो उठता है, इसमें कारण केवल अपने स्वरूप को न जानना ही है । विशुद्ध, स्वात्मज्ञानस्वरूप अवश्य ज्ञातव्य आत्मा के बोध से सुख ओर दुःख आदि का अस्तित्व उड जाता है, इसलिए उसीसे यह जीव विश्रान्ति की ओर जा सकता है। न तो वास्तव में वे सुख आदि हैं, न वे मुझको लगते ही हैँ । निरर्थक ही यह मैं उनके चक्कर में आकर स्थित हूँ, यों तत्त्वज्ञान से जब जीव प्रबुद्ध हो जाता है तब वह मुक्ति प्राप्त करता है और शान्त हो जाता है । सुख आदि कोई वस्तु है ही नहीं, इसलिए वे आत्मस्वरूप कभी नहीं हो सकते, इस प्रकार के भीतरी आत्मबोधरूप संवित्ति से जब जीव सुखादि की ओर ताकता नहीं, तब वह विशुद्धरूप से शान्त हो जाता है । यह सब कुछ चिदाकाश ब्रह्मरूप ही है, इस प्रकार का अखण्ड निश्चय जब स्थिति प्राप्त कर लेता है तब, तेलशून्य दीपक की तरह, जीव निर्वाण को प्राप्त हो जाता हे । सुख आदि स्नेह का विनाश हो जानेपर दीपक के समान जीव शान्त हो जाता है । यह दृश्यमान समस्त जगत्‌ ब्रह्मस्वरूप है, इस प्रकार की अखंडाकारवृत्ति से जनित जो एेक्य भावना है, उस भावना से पुरुष सम्पूर्ण जगत्‌ में शून्यरूपता का अनुभव कर कदापि क्षोभ को प्राप्त नहीं करता