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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 57–75

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 57–75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 57-75

संस्कृत श्लोक

ईषद्ध्यानाद्गतान्यत्वं क्षणादम्बुतरङ्गवत् । पपात विपिने तस्मिन्द्विजपुत्रकरूपिणी ॥ ५७ ॥ भर्तुरध्याजगामाग्रं मन्दस्मितलसन्मुखी । ददर्श द्विजपुत्रं तं पुरो यातं शिखिध्वजः ॥ ५८ ॥ वनान्तरादुपायातं तपो मूर्तिमिवास्थितम् । द्रवत्कनकगौराङ्गं मुक्ताहारविभूषितम् ॥ ५९ ॥ शुक्लयज्ञोपवीताङ्गं शुक्लाम्बरयुगावृतम् । कमण्डलुधरं कान्तं पुरो यातं शिखिध्वजः ॥ ६० ॥ व्याप्तप्रकोष्ठद्विगुणेनाक्षसूत्रेण चारुणा । भूमावलग्नगात्रेण किष्कुमात्रेण च स्थितम् ॥ ६१ ॥ कुन्तलव्याप्तमूर्धानं सालिमालमिवाम्बुजम् । भासयन्तं प्रदेशं तं शारीरैर्दीप्तिमण्डलैः ॥ ६२ ॥ कुण्डलाभूषितमुखं नवमर्कमिवोदितम् । शिखासंप्रोतमन्दारं श्रृङ्गस्थेन्दुमिवाचलम् ॥ ६३ ॥ कान्तोपशान्तवपुषमूर्जितं विजितेन्द्रियम् । हिमाभभस्मतिलकं भूषितालोकसुन्दरम् ॥ ६४ ॥ मेरुहेमतटीलीनपूर्णेन्दुमिव चञ्चलम् । तमालोक्य द्विजसुतं समुत्तस्थौ शिखिध्वजः ॥ ६५ ॥ देवपुत्रागमधिया संपरित्यक्तपादुकः । देवपुत्र नमस्कार इदमासनमास्यताम् ॥ ६६ ॥ इत्यस्य दर्शयामास पाणिना पत्रविष्टरम् । ददौ च द्विजपुत्रस्य पुष्पमुष्टिं करोत्करे ॥ ६७ ॥ चन्द्रः कुमुदखण्डस्य प्रालेयमिव पल्लवे । हे राजर्षे नमस्तुभ्यमिति द्विजसुतोऽवदत् ॥ ६८ ॥ गृहीत्वा कुसुमान्यस्माद्विवेश पत्रविष्टरे । शिखिध्वज उवाच । देवपुत्र महाभाग कुत आगमनं कृतम् । दिवसः सफलो मन्ये यत्त्वामद्यास्मि दृष्टवान् ॥ ६९ ॥ इदमर्घ्यमिदं पाद्यं पुष्पाणीमानि मानद । इमा प्रग्रथिता माला गृह्यन्तां भद्रमस्तु ते ॥ ७० ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा पाद्यमर्घ्यं च मालां पुष्पाणि चानघ । शिखिध्वजस्तदिष्टायै ददौ देव्यै यथाखिलम् ॥ ७१ ॥ चूडालोवाच । सुबहूनि परिभ्रान्तो भूतलायतनान्यहम् । त्वत्तः पूजा यथा प्राप्ता मयेयं न तथान्यतः ॥ ७२ ॥ पेशलेनानुरूपेण प्रश्रयेणामुनानघ । मन्येऽहं नूनमत्यन्तचिरंजीवी भविष्यसि ॥ ७३ ॥ शान्तेन मनसोदारमारादुन्मुक्तकल्पनम् । निर्वाणार्थं तपः साधो कच्चित्संभृतवानसि ॥ ७४ ॥ असिधारासमं सौम्य शान्तव्रतमिदं तव । स्फीतं यद्राज्यमुत्सृज्य महावननिषेवणम् ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

वह चूडाला ब्राह्मणकुमार कैसे बन गयी, यह बतलाते हैं। पूर्वोक्त अग्नि और चन्द्र की धारणारूप किंचित्‌ ध्यान से एक ही क्षण में जलतरंग की नाई पुरुषरूपता को प्राप्त हो गयी और ब्राह्मणकुमार का रूप धारण करके वह चूडाला उसी जंगल में जा गिरी । मन्द मुस्कान से शोभ रहे मुखवाली वह चूडाला अपने स्वामी के आगे आ धमकी ओर शिखिध्वज ने अपने सामने आकर खड़े हुए उस ब्राह्मणकुमार को देखा, जो एक दूसरे जंगल से आए हुए मूर्तिमान्‌ तप के सदृश अवस्थित, पिघल रहे सुवर्ण के समान गौरांग, मोतियों के हार से विभूषित, शुक्ल यज्ञोपवित से विराजमान, शुक्ल दो वस्त्रो से आवृत्त, कमण्डलधारी तथा अत्यन्त कान्ति से युक्त सामने आकर खडा था। मणिबन्ध से नीचे द्विगुण बाह्य प्रदेश को व्याप्त करनेवाली, हस्तप्रमाण, बहुत लम्बी न होने के कारण भूमि में न लगी हुई सुन्दर अक्षमाला से सुशोभित, भ्रमरो की माला से व्याप्त कमल की नाई कुन्तलो (सिर के बालों) से व्याप्त मस्तकवाले, शरीरके दीप्तिमण्डलों से उस प्रदेश को प्रकाशित कर रहे, कुण्डलो से विभूषित मुखवाले, नवीन उदित सूर्य के समान, अपनी शिखा में मन्दार की माला पिरोये हुए, अतएव जिसके शिखर पर चन्द्रमा स्थित है ऐसे पर्वत की नाई स्थित, कान्त तथा उपशान्त शरीरधारी, बलशाली जितेन्द्रिय, हिम के समान कान्ति से युक्त भस्मतिलक से सुशोभित, अतएव भूषित आलोक की नाई सुन्दर तथा सुमेरू पर्वत की सुवर्णतटी में अवस्थित गंगाप्रवाह में प्रतिबिम्बित पूर्ण चन्द्रमा की नाई चंचल उस ब्राह्मण कुमार को देखकर राजा शिखिध्वज उठ खड़ा हो गया । देवपुत्र के आगमन की बुद्धि से अपनी खड़ाऊँ छोडकर राजा शिखिध्वज ने कहा : हे देवपुत्र, आपको नमस्कार है, यह आपके लिए आसन है, कृपाकर इस पर बैठ जाइये । यों कहकर अपने हाथ से उसको पत्रनिर्मित आसन दिखलाया ओर उस ब्राह्मणकुमार के करतल में पुष्पमुष्टि उस तरह दी, जिस तरह कुमुदखण्ड के पल्लव में चन्द्रमा हिमकणजाल देता हे । उस ब्राह्मणकुमार ने भी कहा : हे राजर्षे, तुम्हें नमस्कार है । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे महाभाग देवपुत्र, आपने कहाँ से आगमन किया ? मैं आज का दिन सफल समझता हूँ, क्योकि आज मैने आपका दर्शन किया है । हे मानद, यह अर्घ्य है, यह पाद्य है, ये फूल हैं और गुँथी हुई ये मालाएँ है, लीजिए, आपका कल्याण हो । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे पापशून्य श्रीरामचन्द्रजी, यों कहकर ब्राह्मण-कुमार वेषधारी उस अपनी प्रियतमा को राजा शिखिध्वज ने अर्घ्य, पाद्य, माला ओर पुष्पादि शास्त्रोक्त विधि से दिये । चूडाला ने कहा : हे राजर्षे, इस भूतल पर मैंने अनेक जगहों में परिभ्रमण किया परन्तु जैसी पूजा मैंने तुमसे प्राप्त की, वैसी किसी दूसरे से नहीं । हे अनघ, तुम्हारे इस कोमल अनुरूप विनय से मैं समझता हूँ कि तुम निश्चय अत्यन्त चिरंजीवी होओगे | हे साधो, क्या शान्त मन से उदार तप तुमने मोक्ष के लिए संचित किया है, जहाँ फल के संकल्प बहुत दूर फेंक दिये गये हैँ । हे सौम्य, यह जो तुमने अपने विस्तृत राज्य को छोड कर इस महा जंगल का सेवन किया है वह क्रोधशून्य, वनस्थ यतियो का व्रत तलवार की धार के समान है