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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, Verses 55–56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 85, verses 55–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 55,56

संस्कृत श्लोक

तस्मात्तापसरूपेण बोधयामि पतिं क्षणात् । भर्ता कषायपाकेन परिपक्वमतिः स्थितः ॥ ५५ ॥ चेतस्यस्याद्य विमले स्वं तत्त्वं प्रतिबिम्बति । इति संचित्य चूडाला बभूव द्विजदारकः ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले ही तपस्वी के वेष से उसे क्‍यों नर्ही बोधित किया, इस पर कहते हैँ । अब मेरा स्वामी रागादि वासनाओं के परिपाक से परिपक्वमति होकर स्थित हे । इसके विमल चित्त में आत्मतत्त्व भलीभाँति प्रतिबिम्बित होगा, यों विचाकर चूडाला ब्राह्मणपुत्र बन गयी