Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 59
अद्जवनवाँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग जिस दृष्टि से जीवन्मुक्त-पद में चिति की स्पन्दरहित, विषयों से निर्मुक्त ओर निश्चल स्थिति होती है, उसका वर्णन ।
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- Verses 1–4महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, मेरे द्वारा कही जानेवाली सम्पूर्णं पापों की विनाशक दृष्…
- Verses 5–11चेत्य एवं संवेद्य से विनिर्मुक्त संवित् की वह परा स्थिति "यतो वाचो निवर्तन्ते" इत्यादि श…
- Verse 12किस प्रकार के विचार से वे जगद्रूप भाव विशीर्ण हो जाते हैं ? इस आशंका पर उन विचारों को दिख…
- Verse 13वह बुद्धि किसी तरह प्राप्त भी हो जाय, फिर भी “उससे जनित आदि, मध्य, अन्त आदि परिच्छेद ओर स…
- Verses 14–15इस प्रकार के विचारवान् पुरुष की वह स्थिति लोक-शास्त्र से अविरुद्ध व्यवहार काल में भी दूर…
- Verses 16–17व्यवहारकाल में उस प्रकार की स्थिति से महात्मा का पतन नहीं होता, इसमें युक्ति बतलाते हैं।…
- Verses 18–24चिन्मणिरूप उस जीवन्मुक्त में किस तरह व्यवहार होते हैं ? ऐसी यदि शंका हो तो इस पर वहाँ दर्…
- Verses 25–28तव जीवन्मुक्त में वह संसार कैसे अवशिष्ट रहता है ? इस पर कहते है। विवर्तशून्य केवल आत्मरूप…
- Verses 29–30ऐसा कौन कारण है, जिससे यह विषयों का चिन्तन नहीं करता ? इस पर कहते हैं । श्रीरामभद्र, आत्म…
- Verse 31अव फिर दूसरा लक्षण बतलाते हैं। “मेरा आत्मचैतन्य ही भोक्ता, भोग्य एवं भोगो के आकार से स्पन…
- Verse 32जनसाधारण की तरह उसकी जो देहधारण के साधन भोगो मे प्रवृत्ति है, वह तो वृथा चेष्टा ही है, यह…
- Verse 33शंका हो कि यदि वह वृथा चेष्टा है, तो “सव लोगों द्वारा किया गया दण्डो से आकाश-ताडन मेरा ही…
- Verses 34–36यह चिति जब तक अज्ञान से आवृत्त रहती है तब तक स्वप्रकाश्य वृत्ति आदि के वर्ग में प्रविष्ट…
- Verses 37–39प्राण-चेष्टा की आत्यन्तिक शान्ति भी वही है, यह कहते हैं। स्पन्दरहित पवन का जो रूप न सत्…
- Verse 40श्रीरामजी, “मुझे मोक्ष हो" यह बोध ही आत्मा की पूर्णता के नाश का हेतु है ओर "वह (मोक्ष) न…
- Verses 41–43स्वयंप्रकाश, चैतन्यरूप, सब पदार्थो का आश्रय ओर विषयोन्मुखता से रहित चिति का जो स्वरूप है,…
- Verses 44–45तब भला कौन- सा बन्ध, मोक्ष आदि व्यवहारो के योग्य पदार्थ है ? उसे कहते हैं। संकल्पशब्द का…
- Verses 46–48इस प्रकार प्रबुद्ध चैतन्य के द्वारा स्पन्द और स्पन्दमय पवन के क्षीण कर दिये जानेपर तन्मूल…