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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 18–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verses 18–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 18-24

संस्कृत श्लोक

न यस्य हृदयोल्लेखो मनागपि स मुक्तिभाक् । अविभागमिवादर्शे चिन्मणौ प्रतिबिम्बति ॥ १८ ॥ चितेः परमनैर्मल्याद्व्यवहारो यथा गतः । चिच्चमत्कृतिरेवेयं जगदित्यवभासते ॥ १९ ॥ नेहास्त्यैक्यं न च द्वित्वं ममादेशोऽपि तन्मयः । वाच्यवाचकशिष्येहागुरुवाक्यैश्चमत्कृतैः ॥ २० ॥ आत्मनात्मनि शान्तैव चिच्चमत्कुरुते चिति । चित्प्रस्पन्दो हि संसारस्तदस्पन्दः परं पदम् ॥ २१ ॥ चित्स्पन्दशमनेनेयं परिशाम्यति संसृतिः । महाचित्ते नतेऽर्थौऽशभावा यो भावनाक्षयः ॥ २२ ॥ असन्नपि स्वभावं तत्संवित्स्पन्द उदाहृतम् । शून्यत्वमजडं यत्तत्परमाहुश्चितेर्वपुः ॥ २३ ॥ तत्त्वेन भावनायत्ता संसृतिः सानुभूयते । अभावनामात्रलयात्सा च निःसाररूपिणी ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

चिन्मणिरूप उस जीवन्मुक्त में किस तरह व्यवहार होते हैं ? ऐसी यदि शंका हो तो इस पर वहाँ दर्पण ही दृष्टान्त है, यह कहते हैं। दिखाई दे रहा मनुष्यों का व्यवहार दर्पण में जैसे किसी प्रकार का विकार न करके ही प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही चितिरूप मणि में यथाप्राप्त व्यवहार भी चिति में किसी तरह का विकार न करके ही प्रतिबिम्बित होता है, क्योकि चिति समस्त विकार मलों से वर्जित हे । श्रीरामजी, यह एकमात्र चिति का चमत्कार ही जगत्‌-रूप से भासता है । इस चिति में न तो एकत्व है और न द्वित्व ही हे । वाच्य (अर्थ), वाचक (शब्द), शिष्य, ब्रह्महा, गुरु ओर गुरूवाक्यादिस्वरूप व्याख्यान आदि कल्पनारूप चमत्कारो से आपके प्रति दिया जा रहा यह मेरा उपदेश भी चिन्मयरूप ही है । परमार्थतः सर्वोपिद्रवों से रहित ही यह चिति अपने-आप ही अपने स्वरूपभूत चिति में प्रतिबिम्बत होती है । चिति का विवर्त ही संसार है ओर उसका विवर्तं न होना ही मुक्तिरूप परमपद है । चिति के विवर्तं का उपशम हो जाने से ही यह संसार शान्त हो जाता है, अपरिच्छिन्न ब्रह्माकार में चित्त के एकरस हो जाने पर जीव - जगद्रूप परिच्छिन्न भावों का जो विनाश हो जाता है, वही परमपुरुषार्थ और भावना-क्षय हे । चूँकि असद्रूप भी चितिविवर्त (4) अभियुक्तो ने भी कहा है : भावाद्वैतं सदा कुर्यात्‌ क्रियाद्वैतं कर्हिचित्‌ । अद्वैतं त्रिषु लोकेषु नाऽद्रैतं गुरुणा सह ॥ अर्थ : सर्वदा भावना से ही अद्वैत भाव करना चाहिए, कभी भी क्रिया से अद्वैत नहीं । तीनों लोकों में अद्वैतभाव करे, परन्तु गुरु से अद्वैत न करे । उक्त जडस्वभाव जगत्‌ बनाता है, इसलिए विवर्तशून्यता ही चिति का अजड परमचैतन्यरूप शरीर (स्वरूप) है यों अनुभवनिष्ठ महात्मा लोग कहते हैं । श्रीरामजी, अनात्मदर्शनरूप जो संसार है, वह अनात्मभूत जगत्‌ में ततत्वभावना के अधीन है, इसी से वह तत्त्वरूप से अनुभूत होता है, उसमें तत्त्वकी एकमात्र अभावना से जब तत्त्वभावना का लय हो जाता है, तब वह जीवन्मुक्त का संसार बन जाता हे, फिर वह जले हुए पट के समान बन्धन के लिए समर्थ नहीं होता