Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
स्वभावेनैव भोगानां यत्किलानभिवाञ्छनम् ।
चित्तत्स्पन्दैव सर्वात्मरूपिण्यस्तीति निश्चयः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अव फिर दूसरा लक्षण बतलाते हैं।
“मेरा आत्मचैतन्य ही भोक्ता, भोग्य एवं भोगो के आकार से स्पन्दयुक्त होकर सर्वस्वरूप स्थित
है ' इस प्रकार का भीतर उत्तम अभ्यास से युक्त दृढ जो निश्चय है; वही ज्ञत्वशब्द से (जीवन्मुक्तत्वशब्द
से) कहा गया है