Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अविद्यमानाः सद्भावा विचारविशरारवः ।
अहमादौ जगज्जाले मिथ्याभ्रमभरात्मनि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
किस प्रकार के विचार से वे जगद्रूप भाव विशीर्ण हो जाते हैं ? इस आशंका पर उन विचारों को
दिखलाते हैं।
मिथ्याभूत अनेक भ्रमों से व्याप्त इस जगज्जाल में पहले शुद्धस्वरूप मैं कौन-सा औपाधिक
रूपवाला होकर आस्था करूँ ? (शंका हो कि शुद्धस्वरूप भी तुम्हारे आस्था-वन्धन में एकमात्र बुद्धिरुप
उपाधि ही निमित्त होगी ? तो उस पर कहते हैं।) असंग एवं अद्रय स्वरूप मुझे बुद्धिरूप उपाधि भी कैसे
प्राप्त हो सकती है ? उसकी प्राप्ति में कोई भी कारण नहीं है, यह भाव है